Monday, December 31, 2018

" नया साल "

रही सही कसर, मैं छोड़ देता हूं
दिनों को सालों में,तोड़ देता हूं।
समा रंजिश मय,आरज़ू कातिल
दिलो को फिर भी,मैं जोड़ देता हूं।

मुझे कोई फिकर, ना इस बात की,
ना गम मुझे,कुछ उस बात का ।
किरदार हूं मैं ,खुद अपनी कहानी में ,
एक और पन्ना, उस में जोड़ देता हूं।

नया हूं मैं, नई कुछ बात होगी फिर,
नए ख्वाबों में डूबी, नई रात होगी फिर।
हर साल दम तोड़कर, फिर से जी उठा मैं,
उमर को हाशिये पे, छोड़ देता हूं।

रही सही कसर, मैं छोड़ देता हूं
"अधीर", अब मैं कलम तोड़ देता हूं।
--
नरेंद्र पंत
३१ दिसंबर , २०१८

Tuesday, January 9, 2018

" बैचैन अब ये ख्वाब हुए "


पुराने घर के छज्जे पर लटके मधुमक्खी के छत्ते ,
निगरानी करते फूलों की अब,
जाने कब मुरझा जाये ये अरसा हुआ बरसात हुए,
बरसों किताब में सहेजे चिड़िया के पंख, 
अब उड़ने को बेताब हुए ,बैचैन अब ये ख्वाब हुए । 

रेत के दरिया में डूबी सफर की उम्मीदों के,
जम जाने की खाव्हिश में,
फूलों के बागों में जब, कांटो से दो हाथ हुए,
गुमसुम आंखो से बहते सपने, दीवारों से टकरा कर,
राहों के हमराह हुए , बैचैन अब ये ख्वाब हुए।

शाम के रंगों में डूबा , चाय में गीला सूरज,
पढ़ता शक्लों के पन्नों को।
कब से जलता रहता है, बस आंखो में एक प्यास लिए,
इसके ख्वाबों को फुसलाकर, रात की ओट में,
पानी के दिये नवाब हुए , बैचैन अब ये ख्वाब हुए। 

-
नरेंद्र पंत
दिसंबर 2018
 

Thursday, October 13, 2016

कहानियां

कुछ लिखने बैठा , कलम तोड़कर
भावो की गर्दन मरोड़ कर;
बीते बरस की सारी कहानियां,
खुद सुनने आयी ख्वाब छोड़ कर।

अब इन्हें लिखू या इन्हें सुनाऊ ,
जाने दूं या बैठ मनाऊं ;
पर किसकी बारी , ये मारामारी
उफ़ , पहले किसको दफनाऊं।

फिर बरसो बाद उठेंगी ये,
दस्तक देने उन गलियों में;
जो छूट गयी पर याद रही,
उन मूंगफली की फलियों में।

जेबें भर ली , जेबें खाली
सपने झड़ते डाली डाली;
और कविता बनी कहानी की
फिर भी पूरा पन्ना खाली।

अब टूटी कलम को कैसे मनाऊं,
कहाँ से बेरंग स्याही लाऊं,
असमंजस में उलझा फिरता,
कुछ भी बक बक करता जाऊं।

------------------------------------

नरेंद्र पन्त
अक्टूबर २०१६

Saturday, October 24, 2015

play youtube videos in mplayer : fedora 22


  • install mplayer
  • install youtube-dl on your system
sudo dnf install youtube-dl
  • grab the url from your browser for the video or the video list ( we are using the list URL) and replace it in the command below. ( replace the highlighted text with the URL)
sudo mplayer -cookies -cookies-file /tmp/cookie.txt $(youtube-dl -g --cookies /tmp/cookie.txt "https://www.youtube.com/watch?v=GRPh2H10_To&list=PLQZAt8P89Mc-Ggd1mJUGIyjLVEI8sBs4Y&index=1") 
and say thanks to  Kris Occhipinti

watch video tutorial at :

https://www.youtube.com/watch?v=QCuq0_nY3Xk

yes I want you to copy it and watch with mplayer.

Saturday, August 22, 2015

-------------- कतरनें -------------------

" शून्य "

शून्य लिखा था , सुना था , देखा था,
आज महसूस किया है,
इसका ओर ही छोर है , ये चमके तो शोर है,
चुपके से जुड़ता , ये बड़ा चोर है। 
जुड़ा है गुणा जैसा,इसका ये प्यार कैसा,
खुद को बढाकर , मिटा गया मुझे ऐसा। 
जा , कहीं  और जुड़ , कहीं  और चमक
किसी और किताब का तकिया बना,
खुश ? अब तू और मैं बराबर ,तेरा मेरा हिसाब बराबर ।
 

" क्या शाम जलेगी ? "

चलो पानी का टीला बनाये ,
रेत अब रही कहाँ,
खून से धरती सींचे ,
बारिश में वो बात कहाँ,
चलो ये पन्ने जलाये , कही तो आग लगेगी
जितना मैं जल रहा हूँ , क्या कभी कोई शाम जलेगी ?


" चौराहा "

मैं राहों को काटता, दिशाओं को बांटता,
अकेला खड़ा रहता, धूल चाटता। 
हाथ फैलाये कही और भी खड़ा मैं,परिवार में अपने ,हर एक से जुड़ा मैं। 
गाडी हो या नाड़ी मुझे  ढूंढती है ,
ये पूरी दुनिया मेरे चारों ओर घूमती है।
हर कोई परेशान रहता मुझे देखकर,
सिर्फ ये बत्तियां मुझे देख झूमती हैं।

 --
नरेंद्र पंत
२२ अगस्त , २०१५

काश..

मन है एक बार जुड़ जाऊं , ये हर सुबह वही ख़त ख़त की आवाज़ , वही पीली धूप और उसमे पके हुई ईट से पीले काले चेहरे , अब ऊबने से लगे हैं . फिर से मैं जाकर बैठ गया उस  गली के मोड़ पर , दिन को मेरी किस्मत से रश्क था , जो  आज भी वो लेकर आ गया तपता सूरज , एक बूँद  भी जब तक है ,,वो चमकते रहेगा ,,सूख सी गयी है जान ,, खून पसीने की क्या मजाल की आँख उठा कर देख लें . चुपचाप गिरते रहे सालो से जमीं पर , उनके साथ ही बह गए , सारे सवाल और कुछ जवाब . किस्से से कहानियाँ और कहानी से किवदंतियां बनते हुए देखा मैंने उन बूंदों को , चाह्ह्ये खून हो , पसीना हो या पानी ,, क्या फरक पड़ता है , किसे परवाह है ,, कुछ भी गिरे ,, मिटटी गीली होती है कीचड  बनता है ,, और  दुनिया लाँघ कर चली जाती है , अब इसमें भी अगर वाद विवाद होने लगा तो समय बर्बाद हो जायेगा न , उन लोगो का जो देश का भाग्य लिखने गद्दी पर बैठे हैं , मैं कोई खूबसूरत बला थोड़े ही हूँ , जो वो मुझे अपने मोबिल पर भी देखेंगे , मैं तो यूँ जमीन से जुड़ा हूँ की उनकी मोटर कार की पूरी खुली खिड़की से भी नहीं दीखता , पास भी आकर देखे तो उसकी तोंद आड़े आ जाती है ,, मैं तो  मछ्छर  हुआ जी ,, ये कहते कहते दीनू रुक गया .. दूर से कोई आवाज़ लगा रहा था ..

चलो जी ,, चलें .. आ गया न्योता ...अ ओ मुना .. उठा जा ये ,, अभी तक ऊँघ  रहा है .. चावल की  बोरी जैसा .. हिल थोडा .. अपनी तो शाम की रोटी जा जुगाड़ हो गया

.. दीनू यहाँ आ ,,ये आते की बोरी मास्टर जी के यहाँ पहुंचा आ , ले ये पर्ची , इसमें लिखही घर का पता,यह कहते हुए लालाजी ने यूँ जोर से गरज़ना की , की मुन्ना की भी नीद खुल गयी .. बड़ी गैस है ,, पेट मलते हुए लालाजी लेट गए गद्दी पर .  मालिक हमे पढना कहाँ आये ,  आप कान मे फूक दो ,, हम याद कर लेंगे .. दो कदम पीछे हटते हुए दीनू बोला . अच्छा इधर आ , ये था तो न्योता पास आने का , पर मन को संदेह था की ,, भोपल्की तरह मैं गैस त्रासदी का शिकार न हो जाऊं . सही कहा बुजुर्गो ने कि अपने आँख , कान खुले रखो , किसी ने नाक का ज़िक्र नहीं किया. मैं ठहरा अनपद ग्वार लेकिन लकिन इतनी अक्कल तो थी ही, कान के परदे बड़े कर और नाक कि गुफाएं छोटी .. हाँ मालिक बोलिए .. उनके हाथ में पर्ची थमा दी .

एक दिन पड़ोस वाले भीकू की बिटिया समझा रही थी .. कि हम सांस में आफ सीजन लेते हैं , उसदिन तो लगा कि अपने अन्दर मशीन बड़ी सही वाली लगी है , हवा से भी हवा निकाल कर अन्दर करती है .. लेकिन फिलहाल फेफड़ो में जो भी था उसमे ऑफ सीजन  की कमी लग रही थी . मन में दीनू ने सोचा ये हवा के चक्कर में कहाँ रोटी को भूल गया .. हवा से पेट थोड़े ही भरता है . और उठा ली बोरी अपनी पीठ पर.

मास्टर जी का डेरा गाँव के दूसरे छोर पर  पाठशाला से कोई ५० कदम की दूसरी पर था. ये लम्बी सुनहली दाड़ी थी उनकी की छोटी चिड़िया तो घोसला बना के निकल जाये ,उसको खबर हुए बिना। गाँव वाले उनकी बड़ी इज्ज़त करते थे , मास्टर जी ने अपना जीवन बच्चो को पढ़ने के लिए लगा दिया था।  कभी पाठशाला से हटकर कुछ दखा ही नहीं , उम्र ढल रही थी पर आज भी वो उसी जोश के साथ पढ़ाते और यूँ बच्चो को साधते जैसे की इक्कीस की दहलीज़ अभी लांघी हो. किताबो और बच्चो से  से इतना प्यार कि विवाह उनको व्यवधान लगा . यूँ तो मैं कई सालो से लाला के यहाँ काम कर रहा हूँ लेकिन आज पहली बार उनके घर जा रहा हूँ.
याद आ गए वो दिन जब मास्टर जी मुझे धूप में खड़ा होने कि सजा देते थे , तब सबक सीख लिया होता तो आज शायद धूप में न डोलना पड़ता कभी इस गली कभी उस गली.  जैसे जैसे कदम रास्ता नाप रह थे , मन में एक टीस उठा रही थी कि काश . ..

Saturday, March 7, 2015

" रंग "

पिचकारी की धार में , खंजर के वार में ,
ढूंढ रहा गुलाल में , कहाँ छिपा है तू?

ऐब इतने छुपे तुझ में, तू काला, नीला, भूरा, पीला,
मैं भी कुछ ऐसा ही, क्या तू आ छुपा मुझ में?

देखता हूँ छुपकर तुझे, अपने ही भीतर अभी,
तू घुला हुआ हर सांस में , ये एहसास होता कभी,
पर जब खून के संग भागता , हाथ लग जाता तभी। 

है बैर तुझसे कुछ ऐसा , तेरे प्यार जैसा,
तू घुलता भी पानी में , और धुलता भी पानी में, 
सामने कमज़ोर सा , मज़बूत है कहानी में। 

तू उमंग है ? तरंग है ? या जीने का ढंग है ?
पर पता किसको , कौन ढूंढे , यहाँ छिड़ी जंग है.
तू रंग है,  हाँ रंग है।

-- नरेंद्र पंत
७ मार्च २०१५