Thursday, May 2, 2019

Bridge

I held your hand and it was cold,
I felt the warmth when words were told.
right over the river that keeps us apart,
O' old bridge , you have my heart.

You sway with the river when you get old,
You hold the countless stories ,untold ,
You count my steps , you are a piece of art,
when there are  too many , you fall apart

you stand still we come and go,
you are Full metal, from head to toe,
But you have a heart which melts all day,
Wonder , if you get a voice , what will you say.

--
NP / 2019 , 1 May

Sunday, February 24, 2019

peace : Pulwama and hootch tragedy

When the winter was bitter and cold,
When the roses were being sold,
You added the poison in the ale,
You bombed our soldiers into a tale.

O' man, mortal engines of hate
Stop bloodshed clean the slate,
Why not let the peace remain
Why not build the nations again.
 
-- Narendra Pant 
   Feb 2019

Monday, December 31, 2018

" नया साल "

रही सही कसर, मैं छोड़ देता हूं
दिनों को सालों में,तोड़ देता हूं।
समा रंजिश मय,आरज़ू कातिल
दिलो को फिर भी,मैं जोड़ देता हूं।

मुझे कोई फिकर, ना इस बात की,
ना गम मुझे,कुछ उस बात का ।
किरदार हूं मैं ,खुद अपनी कहानी में ,
एक और पन्ना, उस में जोड़ देता हूं।

नया हूं मैं, नई कुछ बात होगी फिर,
नए ख्वाबों में डूबी, नई रात होगी फिर।
हर साल दम तोड़कर, फिर से जी उठा मैं,
उमर को हाशिये पे, छोड़ देता हूं।

रही सही कसर, मैं छोड़ देता हूं
"अधीर", अब मैं कलम तोड़ देता हूं।
--
नरेंद्र पंत
३१ दिसंबर , २०१८

Tuesday, January 9, 2018

" बैचैन अब ये ख्वाब हुए "


पुराने घर के छज्जे पर लटके मधुमक्खी के छत्ते ,
निगरानी करते फूलों की अब,
जाने कब मुरझा जाये ये अरसा हुआ बरसात हुए,
बरसों किताब में सहेजे चिड़िया के पंख, 
अब उड़ने को बेताब हुए ,बैचैन अब ये ख्वाब हुए । 

रेत के दरिया में डूबी सफर की उम्मीदों के,
जम जाने की खाव्हिश में,
फूलों के बागों में जब, कांटो से दो हाथ हुए,
गुमसुम आंखो से बहते सपने, दीवारों से टकरा कर,
राहों के हमराह हुए , बैचैन अब ये ख्वाब हुए।

शाम के रंगों में डूबा , चाय में गीला सूरज,
पढ़ता शक्लों के पन्नों को।
कब से जलता रहता है, बस आंखो में एक प्यास लिए,
इसके ख्वाबों को फुसलाकर, रात की ओट में,
पानी के दिये नवाब हुए , बैचैन अब ये ख्वाब हुए। 

-
नरेंद्र पंत
दिसंबर 2018
 

Thursday, October 13, 2016

कहानियां

कुछ लिखने बैठा , कलम तोड़कर
भावो की गर्दन मरोड़ कर;
बीते बरस की सारी कहानियां,
खुद सुनने आयी ख्वाब छोड़ कर।

अब इन्हें लिखू या इन्हें सुनाऊ ,
जाने दूं या बैठ मनाऊं ;
पर किसकी बारी , ये मारामारी
उफ़ , पहले किसको दफनाऊं।

फिर बरसो बाद उठेंगी ये,
दस्तक देने उन गलियों में;
जो छूट गयी पर याद रही,
उन मूंगफली की फलियों में।

जेबें भर ली , जेबें खाली
सपने झड़ते डाली डाली;
और कविता बनी कहानी की
फिर भी पूरा पन्ना खाली।

अब टूटी कलम को कैसे मनाऊं,
कहाँ से बेरंग स्याही लाऊं,
असमंजस में उलझा फिरता,
कुछ भी बक बक करता जाऊं।

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नरेंद्र पन्त
अक्टूबर २०१६

Saturday, October 24, 2015

play youtube videos in mplayer : fedora 22


  • install mplayer
  • install youtube-dl on your system
sudo dnf install youtube-dl
  • grab the url from your browser for the video or the video list ( we are using the list URL) and replace it in the command below. ( replace the highlighted text with the URL)
sudo mplayer -cookies -cookies-file /tmp/cookie.txt $(youtube-dl -g --cookies /tmp/cookie.txt "https://www.youtube.com/watch?v=GRPh2H10_To&list=PLQZAt8P89Mc-Ggd1mJUGIyjLVEI8sBs4Y&index=1") 
and say thanks to  Kris Occhipinti

watch video tutorial at :

https://www.youtube.com/watch?v=QCuq0_nY3Xk

yes I want you to copy it and watch with mplayer.

Saturday, August 22, 2015

-------------- कतरनें -------------------

" शून्य "

शून्य लिखा था , सुना था , देखा था,
आज महसूस किया है,
इसका ओर ही छोर है , ये चमके तो शोर है,
चुपके से जुड़ता , ये बड़ा चोर है। 
जुड़ा है गुणा जैसा,इसका ये प्यार कैसा,
खुद को बढाकर , मिटा गया मुझे ऐसा। 
जा , कहीं  और जुड़ , कहीं  और चमक
किसी और किताब का तकिया बना,
खुश ? अब तू और मैं बराबर ,तेरा मेरा हिसाब बराबर ।
 

" क्या शाम जलेगी ? "

चलो पानी का टीला बनाये ,
रेत अब रही कहाँ,
खून से धरती सींचे ,
बारिश में वो बात कहाँ,
चलो ये पन्ने जलाये , कही तो आग लगेगी
जितना मैं जल रहा हूँ , क्या कभी कोई शाम जलेगी ?


" चौराहा "

मैं राहों को काटता, दिशाओं को बांटता,
अकेला खड़ा रहता, धूल चाटता। 
हाथ फैलाये कही और भी खड़ा मैं,परिवार में अपने ,हर एक से जुड़ा मैं। 
गाडी हो या नाड़ी मुझे  ढूंढती है ,
ये पूरी दुनिया मेरे चारों ओर घूमती है।
हर कोई परेशान रहता मुझे देखकर,
सिर्फ ये बत्तियां मुझे देख झूमती हैं।

 --
नरेंद्र पंत
२२ अगस्त , २०१५