Friday, January 30, 2009

सूर्पनख एवं सुग्रीव

हांय ये कैसा मेल है , वो भी इस घोर कलियुग में। मैं भी आश्चर्यचकित था कि युगों कि दीवारों को लांघकर वानर राज़ यहाँ कैसे आ गए , वो भी मेरी इंजीनियरिंग के प्रथम वर्ष में मिलन समारोह (गेट टुगेदर) में । मुझे वानर राज़ के अस्तित्व के बारे में कोई शंका नहीही है और ना ही कभी थी। बचपन से ही मैं धार्मिक पुस्तकों में पढता रहा हूँ कि प्रभु विभिन्न रूपों में अवतार लेते हैं , और इस बार का अवतार मेरे साथ इंजीनियरिंग कर रहा है ये देखकर मैंने अपने को धन्य मानने लगा था । ये भी सुना था कि जब जब पाप बढ़ते हैं तभी अवतार होते हैं । अब मैं भयभीत था कि कहीं मुझ पापी का संहार करने के लिए तो ये अवतार यहाँ नही । परन्तु मैं एक युवती के हाथो अपना अंत मस्तिष्क पटल पर चित्रित नही कर पा रहा था ।

अब निश्चिंत मन ज्ञान गंगा में गोते लगाने में लिए व्याकुल हो रहा था , मुझे भी कोई आपत्ति नही थी । अरे
प्रभु दर्शन ऐसे ही नही होते , बड़े बड़े ज्ञानी महात्मा अपना जीवन न्योछावर कर देते हैं , तुझे तो जीवन के पहले चतुर्थांस में ही ये सौभाग्य प्राप्त हो गया है । धन्य है तू । अरे प्रभु एक क्षण में गायब हो जाते हैं , तेरे साथ तो पूरे चार वर्ष रहेंगे । मन मयूर ने अपने पंख फैला ही लिए थे कि , मैंने सोचा कि एक बार फिर से परिचय लेकर प्रभु के अवतार कि पुष्टि कर लेता हूँ ।

मुझे उस मिलन समारोह में सूचना प्रोद्योगिकी के कुछ प्रिय वरिष्ठ बंधुओं द्वारा काले परिधान में लिपटी मेरे वर्ष की एक युवती का नाम पता करने के अभियान पर भेजा गया था । अभियान इसलिए कह रहा हूँ कि अनजान कन्या से उसका परिचय प्राप्त करने की कोशिश के
बहुत दुष्परिणाम हो सकते हैं । कही रूप का कोई पुजारी आपकी बलि देने के लिए तैयार बैठा हो । साथ ही वो अपनी प्रकृति की कुछ और जीवत्माओ से घिरी थी , सो बेज्ज़ती का और खतरा था । कन्या वर्ग से अपना कोई परिचय भी नही था । अरे कभी मौका ही नही मिला , मौका मिला तो आलस्य के मारे उसे हाथ से जाने दिया। आलस्य का पुतला मैं उसी वस्तु के लिए प्रयत्न करना उचित समझता था जो खत्म होने जा रही हो और मेरे विचार से संसार से कन्याओ का खात्मा नामुमकिन था । क्यूंकि पुरूष उसका अंत नही कर सकता , यह मैं पुरुषों कि शक्ति को नही ललकार रहा , बस अनुमान लगा रहा हूँ । और अनुमान थोड़ा सा सही भी है , अंत करने के लिए शस्त्र होने चाहिए , पुरूष के पास सिर्फ़ एक है , बल , और नारी के पास अनेक । उनका वर्णन करने
से ये नारी पुराण बन जाएगा सो मैं अपनी लेखनी को उस धारा से विमुख कर रहा हूँ । डरते डरते मैं उस युवती से नाम पूछने गया । दूर वो वरिष्ठ बंधु हाल के एक कोने में स्वेत्वर्ण कुल्फी अपने मुंह में लपटाए मेरी प्रतीक्षा कर रहे थे , कार्य पूर्ण ना करने से वो मेरा क्या हाल करते उसका वर्णन क्रूर काम शास्त्र को पुनः लिपिबद्ध करने जैसा होगा ।

अपनी सम्पूर्ण शक्ति को जिव्हा में लेकर , गीत संगीत से गूंज् रहे उस सभागार में मैंने युवती के पास जाकर अंग्रेज़ी भाषा में कहा "एक्स क्यूज़ मी " । अब मैं शब्द विहीन हो गया था , ये पता नही कि क्यों । लेकिन मैंने पूछ ही लिया कि " मे आई नो यौर नेम? " और साथ में मुस्कुरा दिया । और वहां से उत्तर आया " सुग्रीव " । और मेरे मन ने प्रभु दर्शन की भूमिका बांधनी शुरू कर दी।

मन मंथन के उपरांत अब मैं प्रभु अवतार कि पुष्टि कर रहा था , फिर से मैंने नाम पूछा । पुष्टि हो गई । दो बार मेरे कान धोखा नही खा सकते । थोड़ा सा मुख से भी प्रतीत हो रहा था । मैं कुचालें मारता हुआ वरिष्ठ बंधुओं को यह सूचना देने गया । जाते ही पहले मैंने मलाई युक्त कुल्फी का एक सूड्का मारा और बताया कि सुग्रीव है नाम सुग्रीव । मेरा ये कहना था कि मेरे ऊपर लात घूसों कि बरसात हो गई , ये कहू कि प्रलयंकारी बरसात थी तो कदापि अनुचित ना होगा । नरम गद्दे गरम हो गए थे । मुझे धिक्कार के उन्होंने कहा कि " तू किसी काम का नही
, एक लड़की का नाम भी नही पता कर सकता सही से , और तूने ये सोच भी कैसे लिया कि लड़की का नाम सुग्रीव हो सकता है " । सच कहू तो पहली बार सुनने के बाद मैंने भी सोचा था कि इस युवती के परिजनों को कोई और नाम नही मिला क्या ॥ पर मन मयूर तो बावला सा हो गया था प्रभु के अवतार के बारे में सोचकर । अब नाक कट जाने से मैं सूर्पनख बन गया था । मन व्याकुल सा हो गया था और ह्रदय चीख -२ कर कह रहा था कि क्या इस कलियुग में प्रभु कभी अवतार लेंगे ?


जो भी हो , मेरे वरिष्ठ बंधुओं ने मुझे उस मरीचिका का नाम बता दिया था " सुप्रीत " । क्षमा प्रार्थी हूँ मैं सुप्रीत ॥

Wednesday, January 28, 2009

"भ्रमण अथवा परिभ्रमण" - गोल पृथ्वी

मैं किसी अन्य प्राणी की नक़ल पसंद नही करता हूँ , परन्तु अपनी एक परम "बिलाव" मित्र के विगत कुछ दिनों की लेखन के प्रति वाचाल प्रवृति से प्रेरित होकर अपनी बुद्धिमानी का गद्य हस्त्बद्ध कर रहा हूँ . सायंकाल के भ्रमण हेतु मैं अपने निवास स्थान से कई किलोमीटर की दूरी पर स्थित बी टी ऍम लेआउट से ब्रिगेड रोड के लिए निकला। वो एक उद्देश्य की पूर्ति के लिए की जा रही ऑटो रिक्शा यात्रा थी। अपना वाहन न होने की कुंठा उस वक्त ह्रदय को विदीर्ण कर देती है जब किसी मृगी की मोहक द्रिष्टी नयनो की चाहरदीवारी लांघकर आपके आँगन में अठखेलियाँ खेलने लगे और आप उसे सायंकाल के सूरज की तरह यातायात बत्ती पर डूबता देख रहे हों । इसे अपना सौभाग्य कहूँ या विपरीत , मन की यह चंचलता हमेशा चपलता के आयाम से वंचित रही। उन्ही जलती - बुझती बत्तियों का अनुसरण करते हुए वाहनों की कतार जोड़ता - तोड़ता हुआ मैं अपने गंतव्य पर पहुँच गया । द्रव्य का अनाकारण व्यय मन को थोड़ा सा स्थिर कर देता है । ऐसे मन वाला मैं, काले शत्रु की दूकान में चला गया जहाँ से मुझे अपना पतलून लेना था ( यहाँ यह बताना उचित समझूंगा कि यह काला शत्रु और कोई नही ब्लैक बैरी का शोरूम था ). पतलून लेकर मैंने अपने निवास स्थान के लिए पग बढाये ।

अमूमन नए स्थान पर भ्रमण दीर्घ कालीन अनिश्चितताओं का जनक होता है । मैं इस शहर का चांदनी चौक कहलाने वाले इस स्थल पर दूसरी बार आया था , पहली बार मैं यहाँ ठीक एक दिन पहले अपने मित्रो के साथ द्रव्य बहाने की दौड़ में भाग ले रहा था । मुझे यहाँ आने का मार्ग तो सही से पता था किंतु यहाँ से जाने का नही , कातर मन अपनी महाभारत के अभिमन्यु से तुलना करने में व्यस्त था और ह्रदय घर वापिस जाने के लिए आतुर । विद्वानों की भाषा शैली में मैं उपरोक्त वाक्य के आधार पर मूर्ख कहलाता अगर आने और जाने का मार्ग एक ही होता । मैंने उसी दिशा में कदम बढाये जहाँ से मैं पहले दिन अपने मित्रो के साथ आया था । इस समय सायंकाल के छः बज रहे थे । तब मैं उस मार्ग पर पहुँचा जहाँ से मैं अपने निवास स्थान अर्थात ब्रुक फिल्ड से आता हूँ , पर इस मार्ग पर वाहनों के गमन की दिशा मेरे गंतव्य के विपरीत थी । समय की हानि होता हुआ देख मैंने एक यातायात पुलिस कर्मी से मर्थाल्ली जाने का मार्ग पुछा । भारतीय परम्परा को निभाते हुए उसने मुझे बस पकड़ने के लिए स्टाप पहुँचने का मार्ग यूँ बताया - यहाँ से सीधे अगली बत्ती पे जाओ वहां से दाए फिर सीधे अगली बत्ती पर और फिर दाए वहां पर एक स्टाप है वहां से बस मिलेगी । सहायता कितनी ही पीडादायिनी हो , कृतज्ञता अपना अस्तित्व नही मिटने देती । मैंने उस व्याख्यान को सुनकर धन्यवाद कहा और बस पकड़ने की आशा में उस मार्ग पर चल दिया । मार्ग में पूर्व वर्णित पुरूष के दो और बंधुओ से सहायता लेते हुए मैं एक जगह पहुँचा । हास्यप्रद तथ्य यह है की मैं २ किलोमीटर दूरी तय करने के पश्चात वापस बिग्रेड रोड पर पहुँच गया था और मुझे ये पता नही चला कि मैं पिछले एक घंटे से एक वर्ग ( स्कुआ यर ) में गतिशील था , जिसका मेरे घर से निकटतम कोना ब्रिगेड रोड थी । हे ईश्वर ऐसे प्राणी को प्रणाम । मै ब्रिगेड रोड के बगल से निकलता हुआ सेंट्रल माल पहुँचा , उसे देखते ही मुझे बिलाव मित्र का स्मरण हो आया । मुझे ये पता था कि एक स्थान जिसे लाइफ स्टाइल कहते हैं अगर मैं वहां पहुँच जाऊं तो मुझे अपने घर के लिए बस मिल जायेगी । और मैं पथ मै आती हुए हर चकाचौंध भरे कोने को लाइफ स्टाइल समझ उठता था , सेंट्रल मॉल तो मुझे पास जाने पर पता चला दूर से तो वो मुझे लाइफ स्टाइल ही लगा था । उसके बाद एक मोड़ आया और मेरे मन का दीपक ज्योति से जगमगा उठा । अपनी संस्कृति से दूर जल रहे इस दीपक की बाती बहुत छोटी थी । सामने लाइफ स्टाइल की जगह भगवान् विष्णु का वाहन ( गरुड़ )अपने शरीर के कोटरों मे मनुष्यों की आवाजाही का द्योतक बना विराजमान था . अब तन और मन रूपी ईश्वर ज्योति मंद हो चुकी थी . दोनों विश्राम के लिए शेष सैया की इच्छुक थी। एक और यातायात कर्मी के सहयोग से मैंने उसी स्थान से वोल्वो बस पकड़ी और अपने निवास स्थान पहुँच गया । और मैंने ख़ुद को विजयी घोषित किया ।

अगर यह मेरी ज्यामिति अनुकरण का अंत होता तो शायद सही होता । मैंने ये गद्य भी नही लिखा होता । अगले ही दिन अपने किसी मित्र के साथ किसी कार्य के लिए फिर से मैं लाइफ स्टाइल से अगले स्टॉप रिचमोंड रोड गया । वहां पहुंचकर मुझे पिछले जून मे अपने कार्यस्थल के दर्शन हुए । और फिर से बस पकड़ने के लिए मैं उसे सड़क के आगे चलता रहा । मुझे नही पता था की मैं उसी मार्ग पर चल रहा हूँ जहाँ कल मैंने अपनी विजय यात्रा पूरी की थी । थोडी ही देर में एक स्थान पर मैंने पास के पेट्रोल पम्प को देखकर कहा कि ये मैंने कल भी घर जाते हुए देखा देखा था . थोड़ा गर्दन उठा कर देखा तो वह स्थान ब्रिगेड रोड का एक कोना था । अब मुझे ज्ञात हुआ कि मैं पिछले दिन एक ही स्थान का विभिन्न ज्यामितीय आकृतियों में परिभ्रमण कर रहा था । कल मैंने काले शत्रु से निकल कर जहाँ से अपनी पड़यात्रा शुरू कि थी , आज वही से मुझे वो बस मिल गई जिसकी मैंने कल परिभ्रमण काल में प्रतीक्षा की । रही लाइफ स्टाइल की बात , कठिन कठिन ज्यामितीय आकारों की जगह अगर मै एक सीधी रेखा में
गतिमान रहता तो मैं कल ही लाइफ स्टाइल के दर्शन कर लेता .और वहां से घर चला जाता ।

इसे मै ब्रिगेड रोड का भ्रमण कहू या परिभ्रमण , पर इससे मै ज्यामिति और विभिन्न ज्यामितीय आकारों की बरम्बारिक निरंतरता मै निपुण हो गया हूँ . और किंचित मात्र से स्थान में पृथ्वी गोल है इस सिद्धांत का मैंने प्रयोगात्मक अध्ययन कर लिया है ।

Sunday, January 25, 2009

memories

when i was with SUN in the college days ..i had a RW blog there which has now turned into a RO blog . It reminds me the good old college days.

***************blogs.sun.com/npant *********************

Wednesday, January 21, 2009

Inbox Zero - gmail [find unread mails]

i used IMAP service using thunderbird and it was interesting to see inbox unread message count 1 (one) even when i had no unread mails , my inbox is always ZERO . Why i am telling this because before using IMAP the count in the browser was zero for the unread. and now it is one even in the browser. I thought it might be soem sync problem and tried to fix it bt relogging. but no fixes ..

found gmail discussion forum useful and got a way to search unread mails using the search field
typed in :

label:inbox is:unread

and found an unread mail, two years old ... i can't believe it , how i skipped that ... now it again

INBOX ZERO

Tuesday, January 20, 2009

diff wavenumber lines in spectrum of Isotopes

because as in the Bohr theory it is assumes that nucleus is stationary other thn the rotation on its axis , but it can only be true if its mass is infinite , it oscillates about the center of gravity. so reduced mass of the electron is

mu = m M / m + M

where m - mass of the electron , mu - reduced mass , M - mass of the nucleus


Tuesday, January 13, 2009

reset firefox default URL search to google

i was bugged by annoying
search.conduit.com after installing the Live India Toolbar , don't ever install it , it leaves a lot of bugs / spywares in ur system , even after uninstalling.

after removing it , when i typed anything in the address bar , instead of google it was looked in search.conduit.com and this was really shit , even i blocked the site using Block-Site add on it was there. then i fould something really interesting for first time users of configuration file ..of firefox

Type about:config in the address bar and hit enter :)

it asks you to keep the promise :) LOL . do keep that .
then search for

keyword.URL and right click on it and reset it :)

u are home :) happy surfing .Default URL serch is now google ...

Saturday, January 10, 2009

deactivate the caller tune on Vodaphone india

i really hate to have a caller tune, but accidentally i pressed the * at the end of the call and my friends caller tune was copied and now it was mine :( , i just hate that .....

and song was :) -

Tera mujhse hai pahle ka nata koi , yun hi nahi dil lubhata koi , jane tu ya jane na ,,,,,,,,,

to deactivate - send CAN CT to 144 ( toll free ) ..

Wednesday, January 7, 2009

FIREfox 3 on solaris 10

i was just confused why there is no option for firefox update in the default installation with solaris b79 , it was some 2.0.0.9 . Today i decided to update it ,, how can i , if there is no option for that. then i searched for firefox 3 and found it at Finger'sblog . and the i installed it with pkgadd and it was installed in
/opt/sfw/....
then all the plugins were missing . i copied all the plugins from my old setup
/usr/lib/firefox/plugins...... to the new one and it was working , still i am not getting th eralplayer working for firefox ..

i needed to make a i386 folder in /opt/sfw/lib/ and there i put the link for the libjavaplugin_nscp.so

ln -s /usr/jdk/instances/jdk1.6.0/jre/lib/i386/libjavaplugin_nscp.so /opt/sfw/lib/i386/libjavaplugin_nscp.so

this post is from the Mozilla/5.0 (X11; U; SunOS i86pc; en-US; rv:1.9.0.5) Gecko/2008122315 Firefox/3.0.5 Box :)

long live Firefox