Tuesday, December 15, 2009

वो घाव ....

           हिमालय कि गोद में जन्म लेना परम सौभाग्य कि बात कही जा सकती है.  इसे  ईश्वर की असीम अनुकम्पा कहू या पिछले जन्म के कुछ सत्कर्मो का फल , मेरा जन्म देव भूमि उत्तराँचल में हुआ. विषम परिस्थितियों में समता का प्रतीक पर्वतीय अंचल  और उसकी गोद में अटखेलिया करता हुआ मैं, दोनों  उस जनवरी  माह की धूप में वसंत के आगमन की प्रतीक्षा कर रहे थे. मैं इसलिए क्योंकि पीड़ादायिनी ठण्ड मेरे मन और शरीर दोनों को घातक प्रतीत होती थी परन्तु ये पर्वत ना जाने क्यूँ प्रतीक्षारत थे . शायद इस काल के दुशासनों द्वारा धरती माँ का वन रुपी चीर हरण किये जाने के कारण इनकी देह भी शीत के प्रहार को सहने में असमर्थ हो गयी थी. इस चीर हरण का परिणाम  इतिहास के पृष्ठों पर अंकित करने के लिए महाभारत की भांति भगवान् को ही लेखनी उठानी पड़ेगी , क्यूंकि लेखन और प्रतिपादन की मानव निर्मित अत्याधुनिक युक्तियो के   किसी दिव्य नौका के सहारे प्रलय के ग्रास से सकुशल निकलने की सम्भावना मेरे द्वारा करेले के साग को खाए जाने जितनी क्षीण हैं .वैसे द्यूतसभा कोपेनहेगन में ज़ारी है. इस बार राज हड़पने के लिए नहीं कालिख ( कार्बन ) के  साम्राज्य को मिटाने के लिए.

जो भी हो ,, मैं धूप सेक रहा था. ऊष्मा ग्रहण करने के लिए भी कुछ नियम क़ानून हैं. पिताजी ने सिखाया है कि
" घाम पीठ सेइय ऊर आगि " - अर्थात धूप पीठ पर और आग की ओर मुहं कर उन्हें सेकना चाहिए . अब मुझे यह याद नहीं कि जीवन के छठे वसंत की प्रतीक्षा करता हुआ मैं उपरोक्त नियम का पालन कर रहा था या नहीं. मैं शीतावकाश में बागेश्वर आया हुआ था. यह वो नगर है जहाँ विद्यालय ने पहली बार मेरे दर्शन किये थे. मैं एक बहुत ही उज्जड बालक था. इस कथन को पुष्ट करने के लिए बहुत से वर्तांत हैं . फिलहाल उनकी मेरी लेखनी से शत्रुता मान सकते हैं जो उन्हें मैं यहाँ वर्णित नहीं कर रहा.

यहाँ मेरे बहुत सारे मित्र थे , उनमे से कुछ मेरी तरह , और कुछ मेरे से दो कदम आगे. मेरी हर छोटी से छोटी शरारत में मेरी मित्र "मंटू" मेरा साथ दिया करती थी. कक्षा की  एक और मित्र का मुझे अभी भी स्मरण है वो थी "पायल".  पूर्व वर्णित मित्रो से पूरे दो वर्ष बाद मिलने का सुअवसर प्राप्त हुआ था.  मंटू और मैं पडोसी थे, सो आते ही पहले उससे मिला था. यह दूसरा दिन था और सुबह के दस बज रहे थे. तभी मेरे अग्रज मनोज दा ने मुझे आवाज दी कि पायल वहां है, तू उससे  मिला नहीं. सुनते ही मैं इंगित दिशा को भागा. ठीक वक़्त पे मेरी प्रतिभा की पहचान न हो पाई थी  वरना आज "उसेन बोल्ट" को रजत पदक से संतोष करना पड़ता. मैंने देखा  कि वो मंदिर वाले मैदान में खड़ी है , और मैं उसकी ओर भागा जा रहा था .

अभी मैं उसके पास पहुंचा भी नहीं था कि अचानक मुख के विभिन्न भागो में भयानक पीड़ा से मैं धरा पे लोटने लगा. शायद
मित्र से मिलने कि प्रबल इच्छा ने  मुझे अंधा कर दिया था जो मैं उस मैदान के चारो ओर लगी कंटीली लोहे की तार- बाड़ को नहीं देख पाया. भौतिक शास्त्री के दुर्घटना वर्णन के अनुसार गतिमान नरेन्द्र पन्त  और स्थिर कंटीली लोहे की बाड़ के बीच शीर्षाभिमुख टक्कर के फलस्वरूप नरेन्द्र पन्त की गतिज उर्जा अब कंटीली बाड़ की कम्पन उर्जा और नरेन्द्र पन्त की ध्वनि ऊर्जा अर्थात  चीखो में परिवर्तित हो चुकी थी. मुख पे जगह जगह कंटीली बाढ़ ने अपना कौशल दिखा दिया था. बरसाती सड़क की भांति गड्ढे बन चुके थे अंतर सिर्फ उन गड्ढो में भरे द्रव का था. दुर्घटना की भयावहता का अनुमान इस तथ्य  से लगाया जा सकता है कि मेरी जिव्हा के बीचो बीच पोलो मिंट कि गोली जितना बड़ा छिद्र बन गया था पर पोलो मिंट कि गोली जितनी  मात्रा में  ठंडक पहुंचती है उससे दोगुने अनुपात में गर्मी यह घाव पहुंचा रहा था. बड़े भैया दौड़े हुए आये और मुझे ले गए , हमने घर में बताया नहीं . बताने पर तमाचो का भय था. बाल्यावस्था में  तमाचो की संख्या चीटियों की कालोनी की जनसँख्या से कही कम नहीं रही होगी. अत: भय अकारण नहीं कहा जा सकता. लेकिन नवी नवेली दुल्हन की मेहँदी की तरह मेरे रक्तरंजित मुख की कांति छिपी न रह सकी.

तमाचो ने अपनी महत्ता खोने नहीं दी . शायद प्रबलता में कुछ कमी रह गयी हो . वैसे भी हर तूफ़ान सुनामी हो तो अनर्थ न हो जाये. दवा दारू का विधान संपन्न हुआ,  धीरे धीरे घाव भर गए , पर उस मित्र से मैं फिर नहीं मिल पाया. यह घाव शायद ही कभी भर पाए.

5 comments:

अजय कुमार झा said...

एक अलग अंदाज और कमाल की शैली है आपकी .....अच्छा लगा पढना आपका संस्मरण ,,,,,

अजय कुमार झा

परमजीत बाली said...

बहुत रोचक व बढ़िया लगा संस्मरण।आभार।

Richa said...

बचपन के संस्मरणों जितना सुहावना शायद जीवन का और कोई भी संस्मरण नही होता। बहुत अच्छा है। और हाँ- हा हा हा। :)

narendra pant said...

धन्यवाद .

PRAKHAR MITTAL said...

Good Mr Ussane Bolt, i guess you have studied all the figure of speech but simile is your best one... and keep writing i would like to know more about your little love story with payal and etc.....