Tuesday, October 19, 2010

"भयभीत"

जो मन के कोने में  खड़ा, भयभीत सा,
आंसुओं के बाँध पर पहरा करे ,
और अंगूठे की छाप में बहती हुई छोटी नदी,
श्वेत स्वच्छ पटल पर दाग गहरा करे .
  
अब तोड़ता है स्वयं ही तटबंध वो ,
क्रांतिकरी हो रही विचारो की नदिया जो ,
अंचुली में भर, उस धारा के जल को
पलकों के दीवार के उस पार फेंकता ,
निश दिन इस युद्ध को ,निद्रालोक में मौन,
मन अपने भीतर के "भयभीत" से खेलता.

--नरेन्द्र पन्त
१९, अक्तूबर, २०१०

Monday, September 20, 2010

जन्मदिन -3 और आपदा

थोड़ी सी मुड़ी थी , और थोड़ा उडी थी
बादलों के मुकुट पर मोती सी जड़ी थी
मेरे सपनो को छींटे मार के धो देती ,
धरा का आलिंगन कर सखियों के संग रोती.

सवाँरती जीवन को, बुहारती पट माटी के
झीनी खुशबू में डुबो देती तन मन
घनघोर घननाद में उन्मुक्त विचरती
विरह की पीड़ा में बरबस बरसती

इस बरस पीड़ा अंतहीन बूझ पड़ती है ,
बूँद अपनी सखी का हाथ छोडती नहीं ,
बादल की पोटली में सूराख हो गया शायद
देवभूमि  को लील गया वो.
और विधाता की माया देखो --
आपदाओं की छाँव में आज "अल्मोड़ा" रह रहा,
कोई दूर मेरे जन्मदिन का गीत कह रहा ..


-- नरेन्द्र पन्त
२० सितम्बर , २०१०

Wednesday, September 8, 2010

last day at bangalore

"पल भर पहले की दुनिया की खुशियाँ,
डूबती पलकों में सजा कर ले चला हूँ
जिस मोड़ पर मिलेंगे हम फिर,
आधी आधी बाँट लेंगे "
 --- नरेन्द्र पन्त 

Wednesday, August 25, 2010

अतिथि

हवा के पांख लिए उड़ रही रेत,
नयनो में यूँ समां गयी ,
जैसे बरसो की प्यासी हो.
और ये नयन बह रहे हैं,
कह रहे हैं कि,
हम रेत के तूफां को बूंदों से बाँधने चले हैं,
अतिथि की व्याकुलता को साधने चले हैं .
है सुना तुमने कभी पानी से मेड़ को सहारा मिलता हुआ?
देखा क्या, कभी पानी की दीवार से बाँध बनता हुआ ?

    -----नरेन्द्र पन्त
        २५ अगस्त , २०१०

Monday, August 23, 2010

तुम क्या करोगे ?

जो लिख दूँ मैं , तूफां के पाँखो पे  बरसात की स्याही से सतरंगी ख़त
क्या तुम मेरे डाकिये बनोगे?
जो पोंछना चाहूँ  ,चाँद के धब्बे और और मिटाना भाग्य के लेख को
क्या तुम कोई इशारा करोगे ?
हवा पे हाथ फेर, ढक लूँ  सांस की आहट, जीने की निशानी
क्या तुम इस भेद पर उजाला करोगे ?
राह का पत्थर तुम पर वार करे अश्रु बांध को तार तार करे
क्या तुम उसपर निशाना धरोगे ?

मान जाओ तो मेरा ख़त पढना मत , वो तूफां रूठ जायेगा ,
निचोड़ ना देना चाँद को सुबह सुबह पानी में ,
और लीप ना देना हथेली को
कहीं बिगाड़ ना देना मेरे खेल को .
खोल ना देना किवाड़  साँसों के
और पूज लेना पत्थर को देवता समझ .

  ---- नरेन्द्र पन्त
     अगस्त, 2010

Friday, July 30, 2010

मैं यूँ बुरा नहीं हूँ

जीवन की नौका जब दलदल  में फँस गयी ,
तो सदाचार के भार से, स्वयं को हल्का किया
सांसारिक मोह और छल क़ी नदिया आई तो 
आत्मा को दूषित धारा में  छलका दिया.
स्वार्थ क़ी मदिरा,कपट के पात्र से पीता रहा
और मन के पटल पर कालिख पोत कर जीता रहा.

वर्षो बाद आँख खुली और ,
अब ऊँगली की नोंक से,उस कालिख के नगर को
सफ़ेद ,धुंधली गलियों के जाल में बांटता हूँ.
चौराहों की गाँठ से  ,झंझावातो को ,
भविष्य  नौका के पाल में बांधता हूँ .
हथेली क़ी धाराओं में ,
अब सुजनता के आसरे ,
असत्य से लदी उस नाव को खेता हूँ ,
बोझ कम करने का स्वांग रचते हुए ,
राह मिलते नाविकों में,
थोड़ा-थोड़ा ( असत्य ) बाँट देता हूँ.

        --- नरेन्द्र पन्त
            जुलाई ३०, २०१०

Monday, June 28, 2010

जन्म दिवस -2

उम्र के गलियारे में कुलाचे मारते हुए ,
जन्म दिवस का पड़ाव आया.
हल्दी की पोटली ने हाथो को ,
नव परिधानों ने  तन को सजाया.
चलो इस पावन बेला में  मन को भी सजा लो ,
जिसने जना है उनको शीष  नवा लो.

इस बार जन्मदिवस कुछ ऐसे मनाना,
स्वयं से परे किसी की दुनिया सजाना
गौ माता  की थोड़ी सी  सेवा करना  ,
तैतीस करोड़ देवो का आशीष पाना.
आनंद जो मिलेगा फूले नहीं समाओगे  ,
हर घडी , पल छिन को जन्म दिवस पाओगे .

      ---
     नरेन्द्र पन्त
     जून २८ ,२०१०

Saturday, June 26, 2010

बादलों की धुलाई

दोपहर से इन  बादलों को मांज रहा हूँ
ये सफ़ेद होने का नाम ही नहीं ले रहे
एक दूसरे के करीब जाकर , कानो में कुछ कह रहे .

शायद साजिश रच  रहे हैं , मेरे घर को भिगोने की
या बाट जोह रहे हैं ,धान के खेत के  बोने की

 रुई के फाहे हो तुम , ये श्याम रंग कहाँ से लाये ?
शायद किसी युग में तुमने ,धरती से पाप मिटाए ..

आज मानव को  भिगो कर, उसके ह्रदय की कालिख धो दो
अकुलाये मन को सींच कर, प्रेम के बीज बो दो.

फिर  तुम ऐसे काले बने रहना ,
मैं तुम्हे नहलाने नहीं आऊंगा.
तुम्हे उलाहना भी ना दूंगा
और तुम्हारे ही गीत गाऊंगा .

  ------ नरेन्द्र पन्त
         जून २६, २०१०

Friday, June 25, 2010

चोर क्यूँ हाथ नहीं आता ?

चोर सिपाही का खेल है  होता ,
लाख छुपने  पर भी , मेल है होता
पर बार बार साक्ष्यो को तोलने पर भी
क्यूँ सिपाही है पकड़ा जाता
चोर क्यूँ हाथ नहीं आता ?

 तराजू तो  एक अंधे के हाथ है ,
शायद वहां ,होता नहीं पक्षपात है
इन कथित " जनता के सेवको" की जमात में खोट है
जिनका प्रिय आहार  आम आदमी का वोट है .
अजीब सी आहार प्रवृति है इनकी
पहले आदमी का वोट खाते हैं ,
फिर गाँधी जी की छाप वाले नोट खाते हैं ..
दो रोटी ज्यादा खा लें तो हमें पचती नहीं ,
ये करोडो का राशन खा जाते हैं
और शान से मुस्कुराते हैं ..

फिर भी ,
भूख इनकी शांत होने का नाम नहीं ले रही
गाय भैसों की जुगाली इनको जलन दे रही
तो फिर भूसा खाने में परहेज कैसा
पेट हो बस "लालू" के जैसा

प्रतीत तो हो रहा है कि ये  पूर्ण शाकाहारी हैं ,
पर
शेर - बाघ  इनको देख कर चकित रह जाते हैं
सोचते हैं ...
हम तो एक दो पशु खाते हैं ..
और तृप्त हो जाते हैं ...
ये पांच  साल तक १ अरब लोगो का खून पीते हैं ,
और बिना डकार लिए जीते हैं .

ये आम जनता का गला है काटते ,
धर्म के नाम पर हम भाईयों को बांटते
और हम कटते हैं , बंटते हैं
कोई सपूत इनके खिलाफ आवाज उठाता है ,
तो उसका गला घोट दिया जाता है.
पर ये कभी सलाखों के पीछे  नहीं जाते ..

और तुम इनको हर बार वोट दे आते हो.
खून पीने की चाट लगा आते हो ..
बोल रहे हो ..
ये देश ही है ऐसा  ..
यहाँ सिपाही जेल की हवा है खाता .
अब पता चल गया होगा कि ..
 चोर क्यूँ हाथ नहीं आता ?


---- नरेन्द्र पन्त
      जून २५ , २०१०

Tuesday, May 25, 2010

"जन्मदिवस"

हल्दी की पोटली फिर से हाथ देते हो
मृत्यु की राह पर जीवन को साध देते हो.
सिर्फ एक तारीख बढ़ने भर से ,
जीवन की सीमायें माप लेते हो.

जीवन की ढलती सांझ पर
पल भर मैं कैसा समां बाँध लेते हो.
साँसों  की घटती उम्र को ,
क्यूँ "जन्मदिवस" का नाम देते हो ?

               --  नरेन्द्र पन्त 
                    मई , २०१०    

Monday, May 10, 2010

"माँ" - dedicated to my Mom

साजिश हो कोई , मेरा सहारा है तू
आदि है तू , जीवन की धारा है तू .
आह एक मेरी और वो आंसू तेरा , फिर
तेरी मीठी लोरी , और आँचल का बसेरा .
रात भर  सिरहाने बैठ तू मुझको ताकती
जाने कितनी रातें ना सोयी तू जागती .

थिरकते , उन्मुक्त बचपन को तूने संवारा ,
पुचकारा कभी , कभी लिया डांट  का सहारा.
तुझे कैसे बताऊँ तेरा दुलारा है जो ,
आँखों का तेरी नन्हा तारा है जो
मीलो दूर बैठा है जो  जागता ,
पल पल तेरे आँचल की छाँव मांगता .

सपने में  तेरी मधुर आवाज है गूंजती ,
दोनों हथेलियाँ जुड़कर , माँ तुझे हैं पूजती.
माँगा नहीं कभी वो वरदान है तू
ममता की मूरत है , "माँ" भगवान् है तू .

    ---- नरेन्द्र पन्त
          9 मई  , २०१०

Saturday, May 1, 2010

उत्तरों में प्रश्न बुनता , अधीर कहलाता हूँ .

विपत्त्तियों की सम्पदा कमर तोड़ कर जुटाई है ,
दुविधाओं की भेंट जो पग पग पर पायी है,
आशा की पोटली  में उनको  संजो पाता हूँ ,
उत्तरों में प्रश्न बुनता , अधीर कहलाता हूँ .

पहर के निनाद रुई के फाहों से ढांपता ,
सत्य का गला घोंटते ह्रदय में कांपता
मन के इशारों को किनारा करते हुए,
दो गज दूरी ,  दो बरस में नापता .

पथिक की मुख भंगिमा से दिशाओं को माप,
"थार" के विस्तार में  राह दिखलाता हूँ.
 रेत के सागर में  संशयो को विरल कर,
उत्तरों में प्रश्न बुनता , अधीर कहलाता हूँ .

           ---- नरेन्द्र पन्त 
                अप्रैल , २०१०

Thursday, April 29, 2010

निराश रोते बादलों , तुम्हारा नहीं हूँ मैं

 निराश रोते बादलों , तुम्हारा नहीं हूँ मैं ,
 संघर्ष पथ पर चल रहा हूँ , हारा नहीं हूँ मैं .

 अजान बातो में ,मैं  जानता हूँ  खो रहा ,
 भाग के विपरीत चलता , जागता और सो रहा .
 ध्येय  के प्रवाह में , हूँ मैं जी रहा 
 पर राह के पत्थर , क्यूँ अंगोछे में सी रहा ?
 सफ़ेद काले बादलों को शाम तक मैं ताकता 
 ऊँचाई का भेद कर उन्हें  वर्गों में बांटता
 प्रश्नों के व्यापार में ,हूँ उत्तर को बूझता 
 अपनी ही जीत में ,हूँ हार से जूझता .
 हूँ अज्ञान और विज्ञान के बीच की कोई कड़ी
 समय की सीमा  है , और बची हैं बस दो घडी
 डूबा हुआ हूँ  धैर्य में , बुझा तारा नहीं हूं मैं 

 निराश रोते बादलों , तुम्हारा नहीं हूँ मैं ,
 संघर्ष पथ पर चल रहा हूँ , हारा नहीं हूँ मैं .

                    -- नरेन्द्र पन्त
                       २९ अप्रैल , २०१०


 

Wednesday, April 14, 2010

"जीवन "

धरती पर "जीवन " के  अंत पर  "जीवन " के वचन ---
उत्तर ही प्रश्न बने तो क्यूँ ना जगे लालसा,
जब औद्योगिक विकास ही मंडरा रहा हो काल सा.
" जीवन " की मृत्यु पर रुदाली जाये  रूठ सी,
धरती पर जीवन की कहानी बने  झूठ सी.


 तो डूंढ लेना फिर मुझे , गतिमान दूरदर्शी से , 
या प्रतिविम्ब ही निहार लेना , किसी  गोल अर्सी से 
तारों  की ओट में छिपकर खिलखिलाऊंगा,
कितना भी यत्न कर , मैं निकट नहीं आऊंगा :)
दिख जाऊं गर किसी सुदूर ग्रह के पानी में , 
या सुनाई दूं  बूढी नानी की कहानी में ,
स्वार्थ के दंभ में ( उसे ), नष्ट करने का अभियान रच 
यही है मानव तेरा नारकी वीभत्स सच.

                               --- नरेन्द्र पन्त 
                                    अप्रैल , २०१०

Tuesday, April 13, 2010

चांद मेरे प्रियतम तेरे पास ना आ पाउंगी.

बूँद से संसार है और ज्ञात उसको सार है , 
रसायनों की मिलावट उसका अविचल प्यार है.
दूषित हुई मैं ,कुम्हलाया तन लिए कुत जाऊंगी ,
चांद  मेरे प्रियतम तेरे पास ना आ पाउंगी.

जीवन दिया और जीव का संहार वो  करने लगा , 
निज मातृ  सदृश धरा का चीर वो  हरने लगा , 
बादलों के पांख लेकर ओझल हो जाऊंगी 
चांद  मेरे प्रियतम तेरे पास ना आ पाउंगी.

सम्मेलनों की बाढ़ में और राजनीति  की  आड़ में 
भविष्य मेरा तय होता कालिख के व्यापार में,
धरा पर संसार है (मेरा)  , मैं क्रूरता  सह जाऊंगी 
चांद  मेरे प्रियतम तेरे पास ना आ पाउंगी.

निकट शायद अंत है , यह वेदना अनन्त है 
प्रयासों की योजना भी मनगढ़ंत है
इस लेखनी से काव्य जग में प्रवाहित हो जाऊंगी 
चांद  मेरे प्रियतम तेरे पास ना आ पाउंगी.
                                      -- नरेन्द्र पन्त
                                     दिनांक - ११ अप्रैल,2010


``यह एक समुद्र की बूँद की व्यथा है , जो मानव के द्वारा जल को दूषित किये जाने के कारण चाँद के पास जाने में अपनी असमर्थता व्यक्त कर रही है .
``चाँद को प्रियतम इसलिए कहा गया है क्यूंकि ,, चाँद की गुरुव्ताकर्षण शक्ति के फलस्वरूप ज्वार- भाटा आता है समुद का जल उसकी ओर आकर्षित होता है ..
``कालिख का व्यापार - "carbon credits"

Monday, April 5, 2010

this i wrote in my dream :)

शायद  सपना था जो  पलकों के शामियाने के उस पार छाई बसंत ऋतू पर तूफां बनकर टूटा , फूलों के बाग़ पल भर में उजड़ने लगे और तिनका तिनका काँप उठा . उस सपने को हकीकत में बदला हुआ देखा खून की उस बूँद ने -

"तलवार की नोंक पर जो बूँद है बैठी हुई , 
आंसुओं में डूबती , सखियों से जूझती ,
बोलती है बिलखती ,
हे मानव ! 
तेरा ही अंश हूँ , तेरा ही वंश हूँ,
तुझे इतना भी ख्याल नहीं ,
जीने दे मुझे , अब मैं खून सी लाल नहीं "

....वह  एक युद्ध था . जिसे उस खून की बूँद ने खुली आँखों से देखा और मैंने अपनी बंद आँखों से.

-- नरेन्द्र पन्त
दिनांक - ५ अप्रैल , २०१०

Saturday, April 3, 2010

one more

 किस्सों में हम यूँ बयां हो गए , पता ही ना चला कहाँ खो गए
बोये थे प्यार के बीज हमने  , जवाँ नफरत के बियाबान हो गए.
-- नरेन्द्र पन्त
   दिनांक - ०३/०४/२०१०

Thursday, March 25, 2010

मेरी कृति

 वर्तमान परिपेक्ष में मानव के व्यव्हार को देख काल रुपी सर्प की व्यथा --- 

भ्रमित वो काल ब्याल ,
निद्रा कि कोख से .
जागकर फुफुक उठा
धरिणी कि ओट से .
विस्मित हो पूछता कौन मेरा ग्रास है?
वो मनु पुत्र  जिसे निज रक्त की प्यास है!
विध्वंस और अंत को , प्रलय की प्रज्ञा कहाँ
विनाश की छाँव है , रहता मानव जहाँ.
इसकी कुटिलता , मैं भस्म ना कर पाउँगा.
कुछ और पहर , मैं भूखा सो जाऊंगा.
                         
          --- नरेन्द्र पन्त
            ( दिनांक - २४/०३/२०१०)