Thursday, March 25, 2010

मेरी कृति

 वर्तमान परिपेक्ष में मानव के व्यव्हार को देख काल रुपी सर्प की व्यथा --- 

भ्रमित वो काल ब्याल ,
निद्रा कि कोख से .
जागकर फुफुक उठा
धरिणी कि ओट से .
विस्मित हो पूछता कौन मेरा ग्रास है?
वो मनु पुत्र  जिसे निज रक्त की प्यास है!
विध्वंस और अंत को , प्रलय की प्रज्ञा कहाँ
विनाश की छाँव है , रहता मानव जहाँ.
इसकी कुटिलता , मैं भस्म ना कर पाउँगा.
कुछ और पहर , मैं भूखा सो जाऊंगा.
                         
          --- नरेन्द्र पन्त
            ( दिनांक - २४/०३/२०१०)

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