Thursday, April 29, 2010

निराश रोते बादलों , तुम्हारा नहीं हूँ मैं

 निराश रोते बादलों , तुम्हारा नहीं हूँ मैं ,
 संघर्ष पथ पर चल रहा हूँ , हारा नहीं हूँ मैं .

 अजान बातो में ,मैं  जानता हूँ  खो रहा ,
 भाग के विपरीत चलता , जागता और सो रहा .
 ध्येय  के प्रवाह में , हूँ मैं जी रहा 
 पर राह के पत्थर , क्यूँ अंगोछे में सी रहा ?
 सफ़ेद काले बादलों को शाम तक मैं ताकता 
 ऊँचाई का भेद कर उन्हें  वर्गों में बांटता
 प्रश्नों के व्यापार में ,हूँ उत्तर को बूझता 
 अपनी ही जीत में ,हूँ हार से जूझता .
 हूँ अज्ञान और विज्ञान के बीच की कोई कड़ी
 समय की सीमा  है , और बची हैं बस दो घडी
 डूबा हुआ हूँ  धैर्य में , बुझा तारा नहीं हूं मैं 

 निराश रोते बादलों , तुम्हारा नहीं हूँ मैं ,
 संघर्ष पथ पर चल रहा हूँ , हारा नहीं हूँ मैं .

                    -- नरेन्द्र पन्त
                       २९ अप्रैल , २०१०


 

Wednesday, April 14, 2010

"जीवन "

धरती पर "जीवन " के  अंत पर  "जीवन " के वचन ---
उत्तर ही प्रश्न बने तो क्यूँ ना जगे लालसा,
जब औद्योगिक विकास ही मंडरा रहा हो काल सा.
" जीवन " की मृत्यु पर रुदाली जाये  रूठ सी,
धरती पर जीवन की कहानी बने  झूठ सी.


 तो डूंढ लेना फिर मुझे , गतिमान दूरदर्शी से , 
या प्रतिविम्ब ही निहार लेना , किसी  गोल अर्सी से 
तारों  की ओट में छिपकर खिलखिलाऊंगा,
कितना भी यत्न कर , मैं निकट नहीं आऊंगा :)
दिख जाऊं गर किसी सुदूर ग्रह के पानी में , 
या सुनाई दूं  बूढी नानी की कहानी में ,
स्वार्थ के दंभ में ( उसे ), नष्ट करने का अभियान रच 
यही है मानव तेरा नारकी वीभत्स सच.

                               --- नरेन्द्र पन्त 
                                    अप्रैल , २०१०

Tuesday, April 13, 2010

चांद मेरे प्रियतम तेरे पास ना आ पाउंगी.

बूँद से संसार है और ज्ञात उसको सार है , 
रसायनों की मिलावट उसका अविचल प्यार है.
दूषित हुई मैं ,कुम्हलाया तन लिए कुत जाऊंगी ,
चांद  मेरे प्रियतम तेरे पास ना आ पाउंगी.

जीवन दिया और जीव का संहार वो  करने लगा , 
निज मातृ  सदृश धरा का चीर वो  हरने लगा , 
बादलों के पांख लेकर ओझल हो जाऊंगी 
चांद  मेरे प्रियतम तेरे पास ना आ पाउंगी.

सम्मेलनों की बाढ़ में और राजनीति  की  आड़ में 
भविष्य मेरा तय होता कालिख के व्यापार में,
धरा पर संसार है (मेरा)  , मैं क्रूरता  सह जाऊंगी 
चांद  मेरे प्रियतम तेरे पास ना आ पाउंगी.

निकट शायद अंत है , यह वेदना अनन्त है 
प्रयासों की योजना भी मनगढ़ंत है
इस लेखनी से काव्य जग में प्रवाहित हो जाऊंगी 
चांद  मेरे प्रियतम तेरे पास ना आ पाउंगी.
                                      -- नरेन्द्र पन्त
                                     दिनांक - ११ अप्रैल,2010


``यह एक समुद्र की बूँद की व्यथा है , जो मानव के द्वारा जल को दूषित किये जाने के कारण चाँद के पास जाने में अपनी असमर्थता व्यक्त कर रही है .
``चाँद को प्रियतम इसलिए कहा गया है क्यूंकि ,, चाँद की गुरुव्ताकर्षण शक्ति के फलस्वरूप ज्वार- भाटा आता है समुद का जल उसकी ओर आकर्षित होता है ..
``कालिख का व्यापार - "carbon credits"

Monday, April 5, 2010

this i wrote in my dream :)

शायद  सपना था जो  पलकों के शामियाने के उस पार छाई बसंत ऋतू पर तूफां बनकर टूटा , फूलों के बाग़ पल भर में उजड़ने लगे और तिनका तिनका काँप उठा . उस सपने को हकीकत में बदला हुआ देखा खून की उस बूँद ने -

"तलवार की नोंक पर जो बूँद है बैठी हुई , 
आंसुओं में डूबती , सखियों से जूझती ,
बोलती है बिलखती ,
हे मानव ! 
तेरा ही अंश हूँ , तेरा ही वंश हूँ,
तुझे इतना भी ख्याल नहीं ,
जीने दे मुझे , अब मैं खून सी लाल नहीं "

....वह  एक युद्ध था . जिसे उस खून की बूँद ने खुली आँखों से देखा और मैंने अपनी बंद आँखों से.

-- नरेन्द्र पन्त
दिनांक - ५ अप्रैल , २०१०

Saturday, April 3, 2010

one more

 किस्सों में हम यूँ बयां हो गए , पता ही ना चला कहाँ खो गए
बोये थे प्यार के बीज हमने  , जवाँ नफरत के बियाबान हो गए.
-- नरेन्द्र पन्त
   दिनांक - ०३/०४/२०१०