Tuesday, April 13, 2010

चांद मेरे प्रियतम तेरे पास ना आ पाउंगी.

बूँद से संसार है और ज्ञात उसको सार है , 
रसायनों की मिलावट उसका अविचल प्यार है.
दूषित हुई मैं ,कुम्हलाया तन लिए कुत जाऊंगी ,
चांद  मेरे प्रियतम तेरे पास ना आ पाउंगी.

जीवन दिया और जीव का संहार वो  करने लगा , 
निज मातृ  सदृश धरा का चीर वो  हरने लगा , 
बादलों के पांख लेकर ओझल हो जाऊंगी 
चांद  मेरे प्रियतम तेरे पास ना आ पाउंगी.

सम्मेलनों की बाढ़ में और राजनीति  की  आड़ में 
भविष्य मेरा तय होता कालिख के व्यापार में,
धरा पर संसार है (मेरा)  , मैं क्रूरता  सह जाऊंगी 
चांद  मेरे प्रियतम तेरे पास ना आ पाउंगी.

निकट शायद अंत है , यह वेदना अनन्त है 
प्रयासों की योजना भी मनगढ़ंत है
इस लेखनी से काव्य जग में प्रवाहित हो जाऊंगी 
चांद  मेरे प्रियतम तेरे पास ना आ पाउंगी.
                                      -- नरेन्द्र पन्त
                                     दिनांक - ११ अप्रैल,2010


``यह एक समुद्र की बूँद की व्यथा है , जो मानव के द्वारा जल को दूषित किये जाने के कारण चाँद के पास जाने में अपनी असमर्थता व्यक्त कर रही है .
``चाँद को प्रियतम इसलिए कहा गया है क्यूंकि ,, चाँद की गुरुव्ताकर्षण शक्ति के फलस्वरूप ज्वार- भाटा आता है समुद का जल उसकी ओर आकर्षित होता है ..
``कालिख का व्यापार - "carbon credits"

3 comments:

Suman said...

nice

narendra pant said...

dhanyawaad suman ji

PRAKHAR MITTAL said...

I hope that Moon is not yoou.... rather that one is not coming to you....
I can just say that is very finest creature of yours....