Wednesday, April 14, 2010

"जीवन "

धरती पर "जीवन " के  अंत पर  "जीवन " के वचन ---
उत्तर ही प्रश्न बने तो क्यूँ ना जगे लालसा,
जब औद्योगिक विकास ही मंडरा रहा हो काल सा.
" जीवन " की मृत्यु पर रुदाली जाये  रूठ सी,
धरती पर जीवन की कहानी बने  झूठ सी.


 तो डूंढ लेना फिर मुझे , गतिमान दूरदर्शी से , 
या प्रतिविम्ब ही निहार लेना , किसी  गोल अर्सी से 
तारों  की ओट में छिपकर खिलखिलाऊंगा,
कितना भी यत्न कर , मैं निकट नहीं आऊंगा :)
दिख जाऊं गर किसी सुदूर ग्रह के पानी में , 
या सुनाई दूं  बूढी नानी की कहानी में ,
स्वार्थ के दंभ में ( उसे ), नष्ट करने का अभियान रच 
यही है मानव तेरा नारकी वीभत्स सच.

                               --- नरेन्द्र पन्त 
                                    अप्रैल , २०१०

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