Monday, April 5, 2010

this i wrote in my dream :)

शायद  सपना था जो  पलकों के शामियाने के उस पार छाई बसंत ऋतू पर तूफां बनकर टूटा , फूलों के बाग़ पल भर में उजड़ने लगे और तिनका तिनका काँप उठा . उस सपने को हकीकत में बदला हुआ देखा खून की उस बूँद ने -

"तलवार की नोंक पर जो बूँद है बैठी हुई , 
आंसुओं में डूबती , सखियों से जूझती ,
बोलती है बिलखती ,
हे मानव ! 
तेरा ही अंश हूँ , तेरा ही वंश हूँ,
तुझे इतना भी ख्याल नहीं ,
जीने दे मुझे , अब मैं खून सी लाल नहीं "

....वह  एक युद्ध था . जिसे उस खून की बूँद ने खुली आँखों से देखा और मैंने अपनी बंद आँखों से.

-- नरेन्द्र पन्त
दिनांक - ५ अप्रैल , २०१०

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