Tuesday, May 25, 2010

"जन्मदिवस"

हल्दी की पोटली फिर से हाथ देते हो
मृत्यु की राह पर जीवन को साध देते हो.
सिर्फ एक तारीख बढ़ने भर से ,
जीवन की सीमायें माप लेते हो.

जीवन की ढलती सांझ पर
पल भर मैं कैसा समां बाँध लेते हो.
साँसों  की घटती उम्र को ,
क्यूँ "जन्मदिवस" का नाम देते हो ?

               --  नरेन्द्र पन्त 
                    मई , २०१०    

Monday, May 10, 2010

"माँ" - dedicated to my Mom

साजिश हो कोई , मेरा सहारा है तू
आदि है तू , जीवन की धारा है तू .
आह एक मेरी और वो आंसू तेरा , फिर
तेरी मीठी लोरी , और आँचल का बसेरा .
रात भर  सिरहाने बैठ तू मुझको ताकती
जाने कितनी रातें ना सोयी तू जागती .

थिरकते , उन्मुक्त बचपन को तूने संवारा ,
पुचकारा कभी , कभी लिया डांट  का सहारा.
तुझे कैसे बताऊँ तेरा दुलारा है जो ,
आँखों का तेरी नन्हा तारा है जो
मीलो दूर बैठा है जो  जागता ,
पल पल तेरे आँचल की छाँव मांगता .

सपने में  तेरी मधुर आवाज है गूंजती ,
दोनों हथेलियाँ जुड़कर , माँ तुझे हैं पूजती.
माँगा नहीं कभी वो वरदान है तू
ममता की मूरत है , "माँ" भगवान् है तू .

    ---- नरेन्द्र पन्त
          9 मई  , २०१०

Saturday, May 1, 2010

उत्तरों में प्रश्न बुनता , अधीर कहलाता हूँ .

विपत्त्तियों की सम्पदा कमर तोड़ कर जुटाई है ,
दुविधाओं की भेंट जो पग पग पर पायी है,
आशा की पोटली  में उनको  संजो पाता हूँ ,
उत्तरों में प्रश्न बुनता , अधीर कहलाता हूँ .

पहर के निनाद रुई के फाहों से ढांपता ,
सत्य का गला घोंटते ह्रदय में कांपता
मन के इशारों को किनारा करते हुए,
दो गज दूरी ,  दो बरस में नापता .

पथिक की मुख भंगिमा से दिशाओं को माप,
"थार" के विस्तार में  राह दिखलाता हूँ.
 रेत के सागर में  संशयो को विरल कर,
उत्तरों में प्रश्न बुनता , अधीर कहलाता हूँ .

           ---- नरेन्द्र पन्त 
                अप्रैल , २०१०