Saturday, May 1, 2010

उत्तरों में प्रश्न बुनता , अधीर कहलाता हूँ .

विपत्त्तियों की सम्पदा कमर तोड़ कर जुटाई है ,
दुविधाओं की भेंट जो पग पग पर पायी है,
आशा की पोटली  में उनको  संजो पाता हूँ ,
उत्तरों में प्रश्न बुनता , अधीर कहलाता हूँ .

पहर के निनाद रुई के फाहों से ढांपता ,
सत्य का गला घोंटते ह्रदय में कांपता
मन के इशारों को किनारा करते हुए,
दो गज दूरी ,  दो बरस में नापता .

पथिक की मुख भंगिमा से दिशाओं को माप,
"थार" के विस्तार में  राह दिखलाता हूँ.
 रेत के सागर में  संशयो को विरल कर,
उत्तरों में प्रश्न बुनता , अधीर कहलाता हूँ .

           ---- नरेन्द्र पन्त 
                अप्रैल , २०१०

1 comments:

Udan Tashtari said...

बहुत बढ़िया.