Monday, June 28, 2010

जन्म दिवस -2

उम्र के गलियारे में कुलाचे मारते हुए ,
जन्म दिवस का पड़ाव आया.
हल्दी की पोटली ने हाथो को ,
नव परिधानों ने  तन को सजाया.
चलो इस पावन बेला में  मन को भी सजा लो ,
जिसने जना है उनको शीष  नवा लो.

इस बार जन्मदिवस कुछ ऐसे मनाना,
स्वयं से परे किसी की दुनिया सजाना
गौ माता  की थोड़ी सी  सेवा करना  ,
तैतीस करोड़ देवो का आशीष पाना.
आनंद जो मिलेगा फूले नहीं समाओगे  ,
हर घडी , पल छिन को जन्म दिवस पाओगे .

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     नरेन्द्र पन्त
     जून २८ ,२०१०

Saturday, June 26, 2010

बादलों की धुलाई

दोपहर से इन  बादलों को मांज रहा हूँ
ये सफ़ेद होने का नाम ही नहीं ले रहे
एक दूसरे के करीब जाकर , कानो में कुछ कह रहे .

शायद साजिश रच  रहे हैं , मेरे घर को भिगोने की
या बाट जोह रहे हैं ,धान के खेत के  बोने की

 रुई के फाहे हो तुम , ये श्याम रंग कहाँ से लाये ?
शायद किसी युग में तुमने ,धरती से पाप मिटाए ..

आज मानव को  भिगो कर, उसके ह्रदय की कालिख धो दो
अकुलाये मन को सींच कर, प्रेम के बीज बो दो.

फिर  तुम ऐसे काले बने रहना ,
मैं तुम्हे नहलाने नहीं आऊंगा.
तुम्हे उलाहना भी ना दूंगा
और तुम्हारे ही गीत गाऊंगा .

  ------ नरेन्द्र पन्त
         जून २६, २०१०

Friday, June 25, 2010

चोर क्यूँ हाथ नहीं आता ?

चोर सिपाही का खेल है  होता ,
लाख छुपने  पर भी , मेल है होता
पर बार बार साक्ष्यो को तोलने पर भी
क्यूँ सिपाही है पकड़ा जाता
चोर क्यूँ हाथ नहीं आता ?

 तराजू तो  एक अंधे के हाथ है ,
शायद वहां ,होता नहीं पक्षपात है
इन कथित " जनता के सेवको" की जमात में खोट है
जिनका प्रिय आहार  आम आदमी का वोट है .
अजीब सी आहार प्रवृति है इनकी
पहले आदमी का वोट खाते हैं ,
फिर गाँधी जी की छाप वाले नोट खाते हैं ..
दो रोटी ज्यादा खा लें तो हमें पचती नहीं ,
ये करोडो का राशन खा जाते हैं
और शान से मुस्कुराते हैं ..

फिर भी ,
भूख इनकी शांत होने का नाम नहीं ले रही
गाय भैसों की जुगाली इनको जलन दे रही
तो फिर भूसा खाने में परहेज कैसा
पेट हो बस "लालू" के जैसा

प्रतीत तो हो रहा है कि ये  पूर्ण शाकाहारी हैं ,
पर
शेर - बाघ  इनको देख कर चकित रह जाते हैं
सोचते हैं ...
हम तो एक दो पशु खाते हैं ..
और तृप्त हो जाते हैं ...
ये पांच  साल तक १ अरब लोगो का खून पीते हैं ,
और बिना डकार लिए जीते हैं .

ये आम जनता का गला है काटते ,
धर्म के नाम पर हम भाईयों को बांटते
और हम कटते हैं , बंटते हैं
कोई सपूत इनके खिलाफ आवाज उठाता है ,
तो उसका गला घोट दिया जाता है.
पर ये कभी सलाखों के पीछे  नहीं जाते ..

और तुम इनको हर बार वोट दे आते हो.
खून पीने की चाट लगा आते हो ..
बोल रहे हो ..
ये देश ही है ऐसा  ..
यहाँ सिपाही जेल की हवा है खाता .
अब पता चल गया होगा कि ..
 चोर क्यूँ हाथ नहीं आता ?


---- नरेन्द्र पन्त
      जून २५ , २०१०