Friday, June 25, 2010

चोर क्यूँ हाथ नहीं आता ?

चोर सिपाही का खेल है  होता ,
लाख छुपने  पर भी , मेल है होता
पर बार बार साक्ष्यो को तोलने पर भी
क्यूँ सिपाही है पकड़ा जाता
चोर क्यूँ हाथ नहीं आता ?

 तराजू तो  एक अंधे के हाथ है ,
शायद वहां ,होता नहीं पक्षपात है
इन कथित " जनता के सेवको" की जमात में खोट है
जिनका प्रिय आहार  आम आदमी का वोट है .
अजीब सी आहार प्रवृति है इनकी
पहले आदमी का वोट खाते हैं ,
फिर गाँधी जी की छाप वाले नोट खाते हैं ..
दो रोटी ज्यादा खा लें तो हमें पचती नहीं ,
ये करोडो का राशन खा जाते हैं
और शान से मुस्कुराते हैं ..

फिर भी ,
भूख इनकी शांत होने का नाम नहीं ले रही
गाय भैसों की जुगाली इनको जलन दे रही
तो फिर भूसा खाने में परहेज कैसा
पेट हो बस "लालू" के जैसा

प्रतीत तो हो रहा है कि ये  पूर्ण शाकाहारी हैं ,
पर
शेर - बाघ  इनको देख कर चकित रह जाते हैं
सोचते हैं ...
हम तो एक दो पशु खाते हैं ..
और तृप्त हो जाते हैं ...
ये पांच  साल तक १ अरब लोगो का खून पीते हैं ,
और बिना डकार लिए जीते हैं .

ये आम जनता का गला है काटते ,
धर्म के नाम पर हम भाईयों को बांटते
और हम कटते हैं , बंटते हैं
कोई सपूत इनके खिलाफ आवाज उठाता है ,
तो उसका गला घोट दिया जाता है.
पर ये कभी सलाखों के पीछे  नहीं जाते ..

और तुम इनको हर बार वोट दे आते हो.
खून पीने की चाट लगा आते हो ..
बोल रहे हो ..
ये देश ही है ऐसा  ..
यहाँ सिपाही जेल की हवा है खाता .
अब पता चल गया होगा कि ..
 चोर क्यूँ हाथ नहीं आता ?


---- नरेन्द्र पन्त
      जून २५ , २०१०

1 comments:

Udan Tashtari said...

आपने तो पता भी कर लिया.. :)

बढ़िया रचना!