Saturday, June 26, 2010

बादलों की धुलाई

दोपहर से इन  बादलों को मांज रहा हूँ
ये सफ़ेद होने का नाम ही नहीं ले रहे
एक दूसरे के करीब जाकर , कानो में कुछ कह रहे .

शायद साजिश रच  रहे हैं , मेरे घर को भिगोने की
या बाट जोह रहे हैं ,धान के खेत के  बोने की

 रुई के फाहे हो तुम , ये श्याम रंग कहाँ से लाये ?
शायद किसी युग में तुमने ,धरती से पाप मिटाए ..

आज मानव को  भिगो कर, उसके ह्रदय की कालिख धो दो
अकुलाये मन को सींच कर, प्रेम के बीज बो दो.

फिर  तुम ऐसे काले बने रहना ,
मैं तुम्हे नहलाने नहीं आऊंगा.
तुम्हे उलाहना भी ना दूंगा
और तुम्हारे ही गीत गाऊंगा .

  ------ नरेन्द्र पन्त
         जून २६, २०१०

4 comments:

राम त्यागी said...

स्वागत है

Udan Tashtari said...

बहुत खूब!

अजय कुमार said...

शीर्षक से लगा बाद्लों की पिटाई होगी ।
अच्छे भाव ,बधाई ।

कृपया वर्ड-वेरिफिकेशन हटा लीजिये
वर्ड वेरीफिकेशन हटाने के लिए:
डैशबोर्ड>सेटिंग्स>कमेन्टस>Show word verification for comments?>
इसमें ’नो’ का विकल्प चुन लें..बस हो गया..कितना सरल है न हटाना
और उतना ही मुश्किल-इसे भरना!! यकीन मानिये

Pawan said...

wah-wah wah-wah wah-wah....