Friday, July 30, 2010

मैं यूँ बुरा नहीं हूँ

जीवन की नौका जब दलदल  में फँस गयी ,
तो सदाचार के भार से, स्वयं को हल्का किया
सांसारिक मोह और छल क़ी नदिया आई तो 
आत्मा को दूषित धारा में  छलका दिया.
स्वार्थ क़ी मदिरा,कपट के पात्र से पीता रहा
और मन के पटल पर कालिख पोत कर जीता रहा.

वर्षो बाद आँख खुली और ,
अब ऊँगली की नोंक से,उस कालिख के नगर को
सफ़ेद ,धुंधली गलियों के जाल में बांटता हूँ.
चौराहों की गाँठ से  ,झंझावातो को ,
भविष्य  नौका के पाल में बांधता हूँ .
हथेली क़ी धाराओं में ,
अब सुजनता के आसरे ,
असत्य से लदी उस नाव को खेता हूँ ,
बोझ कम करने का स्वांग रचते हुए ,
राह मिलते नाविकों में,
थोड़ा-थोड़ा ( असत्य ) बाँट देता हूँ.

        --- नरेन्द्र पन्त
            जुलाई ३०, २०१०

2 comments:

Sunil Kumar said...

सारगर्भित रचना बधाई

narendra pant said...

dhanyawaad Sunil ji