Wednesday, August 25, 2010

अतिथि

हवा के पांख लिए उड़ रही रेत,
नयनो में यूँ समां गयी ,
जैसे बरसो की प्यासी हो.
और ये नयन बह रहे हैं,
कह रहे हैं कि,
हम रेत के तूफां को बूंदों से बाँधने चले हैं,
अतिथि की व्याकुलता को साधने चले हैं .
है सुना तुमने कभी पानी से मेड़ को सहारा मिलता हुआ?
देखा क्या, कभी पानी की दीवार से बाँध बनता हुआ ?

    -----नरेन्द्र पन्त
        २५ अगस्त , २०१०

Monday, August 23, 2010

तुम क्या करोगे ?

जो लिख दूँ मैं , तूफां के पाँखो पे  बरसात की स्याही से सतरंगी ख़त
क्या तुम मेरे डाकिये बनोगे?
जो पोंछना चाहूँ  ,चाँद के धब्बे और और मिटाना भाग्य के लेख को
क्या तुम कोई इशारा करोगे ?
हवा पे हाथ फेर, ढक लूँ  सांस की आहट, जीने की निशानी
क्या तुम इस भेद पर उजाला करोगे ?
राह का पत्थर तुम पर वार करे अश्रु बांध को तार तार करे
क्या तुम उसपर निशाना धरोगे ?

मान जाओ तो मेरा ख़त पढना मत , वो तूफां रूठ जायेगा ,
निचोड़ ना देना चाँद को सुबह सुबह पानी में ,
और लीप ना देना हथेली को
कहीं बिगाड़ ना देना मेरे खेल को .
खोल ना देना किवाड़  साँसों के
और पूज लेना पत्थर को देवता समझ .

  ---- नरेन्द्र पन्त
     अगस्त, 2010