Tuesday, October 19, 2010

"भयभीत"

जो मन के कोने में  खड़ा, भयभीत सा,
आंसुओं के बाँध पर पहरा करे ,
और अंगूठे की छाप में बहती हुई छोटी नदी,
श्वेत स्वच्छ पटल पर दाग गहरा करे .
  
अब तोड़ता है स्वयं ही तटबंध वो ,
क्रांतिकरी हो रही विचारो की नदिया जो ,
अंचुली में भर, उस धारा के जल को
पलकों के दीवार के उस पार फेंकता ,
निश दिन इस युद्ध को ,निद्रालोक में मौन,
मन अपने भीतर के "भयभीत" से खेलता.

--नरेन्द्र पन्त
१९, अक्तूबर, २०१०

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