Saturday, December 31, 2011

Adios 2011 , last work of the year


sketched on my phone





Monday, December 26, 2011

कुन फाया-कुन - " ' Be' and it is."

मन के मेरे ये भरम , कच्चे मेरे ये करम
ले कर चले हैं कहाँ , मैं तो जानू ही ना..
-- रॉकस्टार

Monday, November 28, 2011

"तू"

खींच कर ,समंदर के किनारे , रख लिए मोड़कर,
खफा जो लम्हे सारे ,अब भूल कर,
मेरी साँसों की आहट से क्या बूझता तू ?

 यूँ डुबाकर, दम घोंट दिया, आंसुओं का पानी में
उस नदी के किनारे अब कांटा डाले ,
 सर्दी की सुबह क्या खोजता तू ?

मिला है तू मेरी आहों से , साजिश में
मेरी कराहों से , टुकड़े टुकड़े कर मेरे
सुई धागा क्यूँ खोजता तू ?

-- नरेन्द्र पन्त
२८ नवम्बर ,२०११

Monday, September 26, 2011

" आह "

मूरत की आँखे ढांपकर ,खेल दी अपनी चाल
व्यर्थ हुए प्रयत्न कब, बनी है न माटी की ढाल.
चुभो लो हजारो बरछी ,करो माँ को लहू लुहान 
द्यूत में बाज़ी लगी है , उछालो मेरा सम्मान.

घोप दिया है खंजर तुमने आखरी उम्मीद पर,
बासंती फूलो  की, ना बन सकी जयमाल .
छोड़ दिया हाथ मेरा , थामने का स्वांग रच,
या झट से खींच लिया, जब जब दिखी मैं बेहाल.

 -- नरेन्द्र पन्त
    २६ सितम्बर,२०११

Monday, September 19, 2011

"किश्त "

मियां हम किश्तों में खुद को क़त्ल कर रहे हैं और तुम हर किश्त में जीवन बीमा एजेंट की तरह रसमलाई सुड़क रहे हो . इतनी मोमबत्तियां क्यूँ जलाई है? दीवाली है क्या ? रावन मारा गया ? अच्छा तो ये मेरे जन्मदिन की ख़ुशी में हैं . वही तो मैं सोचू इस बार रावन जल्दी कैसे मर गया , हर साल तो जब मैं छुट्टी पर घर जाता हूँ तब मरता है . समय का बिलकुल पाबन्द. हमारे मोहल्ले में ठीक बारह बजे मरता है .
        पर पड़ोस वाले मुन्नू  , अरे मुन्नू जो वानर सेना में, इस साल लौलीपोप का लालच देकर भर्ती किया गया  ,उसका कहा माने तो  रावण अंकल , राम भैया का तीर लगने से पहले ही लुडक गए थे. थोड़ी सयानी रिंकी बोली उज्जा ( ओ इजा ) कही ज़हर तो नहीं पी लिया था, तो मुन्नू बोला पता नहीं , बोतल पर "गुलाब" का फूल बना था. चलो मुन्नू को समझ तो आया कि "गुलाब" पीने से इंसान मर सकता है और हम रोजाना ऐसे कई रावण देखते हैं लेकिन कुछ सीखते नहीं .
        जब से सही और गलत का भेद समझ में आया , तब से आज तक सही राह पकड़ने में हमेशा हिचकिचाहट रही . बचपन से सुनता आ रहा हूँ कि सच का रास्ता कठिन होता है, पर अभी तक हमेशा उससे विमुख रहा हूँ. जाने अनजाने सच का गला घोंटना दिनचर्या का अभिन्न अंग बन गया है. कॉर्नर हाउस ( एक रेस्तरां ) में बहुत दफा "डेथ बाई चाकलेट" खायी है, उस वक़्त उन करोडो लोगो की सूरत आँखों के सामने कभी नहीं  घूमती जिन्हें रात को खाली पेट सोना है और रात भर फुटपाथ पर अपनी दमड़ी का बिछोना बनाकर ठिठुरना है या सीखनी है जिनके बच्चे को गिनती ,अपना साथ छोडती हुई साँसों को गिनकर. शायद सही नाम रखा है - डेथ (मौत) तो होती ही है .. मार देता हूँ अपने ईमान को , डुबो देता हूँ उसे चाकलेट के दलदल में. आह ..छब्बीस साल लग गए  छोटी सी बात समझने में. जो चीज़े कल तक बहुत अच्छी लगा करती थी ,क्षण भर में बोझ लगने लगी हैं.
         हर साल २० सितम्बर आता है , अब समझ आया कि क्यूँ , वो ऊपर वाला हर बरस याद दिलाता है मुझे मेरे अस्तित्व की और खोजता है मेरे भीतर अपनी लौ ,जिसका मैं दम घोंटे बैठा हूँ. 
         हे ईश्वर, इस जन्मदिवस पर मुझे शक्ति देना कि मैं खुद से ऊपर ऊपर उठ सकूँ और ये जीवन स्वार्थो से परे हट ,प्राणी मात्र के उत्थान और सेवा कार्य में व्यतीत हो.

मन बहुत व्याकुल है .इकबाल साहब का पैगाम दोहरा लूं ..

 ""दयार-ए-इश्क में अपना मुकाम पैदा कर 
नया ज़माना, नए सुबह-ओ -शाम पैदा कर 
अपना तरीका है फकीरी , अमीरी नहीं 
"खुदी" न बेच , गरीबी में नाम पैदा कर"" - इकबाल

 
-- जन्मदिन मुबारक 
   नरेन्द्र पन्त 

Tuesday, August 23, 2011

टोपी

"आज घर से विश्वविद्यालय तक बहुत सी सफेद टोपियां और बहुत से सिर दिखे । बहुत शरीफ लोग भी थे उनमें शामिल जो सफेद टोपी पहने हुवे थे । तब से निर्णय नहीं कर पा रहा हूँ मैं भ्रष्ट कौन से रंग की टोपी पहनूँ । आप मदद करे़ कृपया ।                                                                                                                      -- श्री सुशील कुमार जोशी
 हायं ,क्या टोपी पहनना वाकई में जरूरी है ? न ही मौसम बदहाल है, जो उससे बचने की ठानो . वैसे ही इतने प्रदूषण से बालो को दमे की शिकायत है, कृपया गला न घोंटे और अगर फैशन के लिए जरूरी समझते हैं तो व्यर्थ मालूम होता है. सभी ने पहनी है ,क्या खाक फैशन ( आजकलक मैसन के फैशनक अत्ति ख़याल छ ). हाँ कोई धार्मिक पहलू है तो जरुर पहनिए , आजकल उपरवाला कुछ खफा मालूम होता .सर पर डंडे की मार थोड़ी कम पीडादायिनी प्रतीत होगी.  कृपया टोपी का प्रयोग (मौलिक और चारित्रिक ) गंजेपन तक सीमित रखें. 

-- नरेन्द्र पन्त  
२३ अगस्त ,२०११



Tuesday, August 16, 2011

"मेरी देशभक्ति"

स्व तंत्र व्यभिचारी  हुआ 
स्वार्थ  के सायों  में,
पुत गए मन कालिख से 
बटवारे की आहों में.
                         
मुझे सिखा दिया गया लिखना
इन काले अक्षरों में,
कोशिश लिखने की बहुत की 
पर कोई पढ़ नहीं  पाता.
                            
और ये,
बरसी उसी पुताई की
सालाना ताने देती मुझको, 
मैं ढोंग करता कुछ पल देशभक्ति का
और बलवा  होने छोड़ देता उसे, फिर एक साल तक.

---
नरेन्द्र पन्त 
१५ अगस्त ,२०११

Sunday, March 13, 2011

"कालिख"

यूँ कलम उठा कर लिखने चला , 
स्याही ने पूछा मुझसे , क्यूँ भला 
विचारो को मुझमे डुबो रहे हो?
शर्म से पानी पानी न हो जाऊं.

मैंने भुलावा दिया कि, गिनते रह  
मेरे शब्दों की धड़कन, 
और बिखरा दी  काले अक्षरों में
मन की "कालिख".

                 --  
                 नरेन्द्र पन्त 
                १३ मार्च, २०११

Monday, February 21, 2011

आदिवासी

जंगल के वीराने में जो ,आदि से रहता आया ,
प्रकृति माँ की गोद में ,खेला और इठलाया.

जो  रक्षा करता धरती  माँ की,भ्रष्ट हो चुके मनु पुत्रो से ,
नहीं छीनता वस्त्र धरा के, ढक लेता तन कुछ टुकडो से.

उसकी  नग्नता को तुम पिछड़ापन कहते हो,
विचारों को संकीर्ण व पारंपरिक नाम देते हो.
जब इठलाते हो कुछ चीथड़ो में समंदर के किनारे,
मुझे भी बताओ  क्यूँ खुद को आधुनिक कहते हो?

 -- नरेन्द्र पन्त 
     २१ फरवरी, २०११

Friday, February 11, 2011

ज़िन्दगी की पहेली

आँख मलते जागती है ,घुटनों  पर भागती है
नाजाने क्यूँ बचपन की,सीमायें लांघती है

फिर  खुली आँख सोती है हर ठोकर पर रोती है
नानी की कहानी , बस सपनो में होती है 

और मैं
तुरुप की चाल चलू ,इसे लूटने  की आश में
रिश्तो की गाँठ लगाऊं , गले की फाँस में
ज्यू खिंचती गयी  डोरी , वो लहराई आकाश में
आह !  कट गयी देखो , अनंत की आश में


अब आँखें बंद हैं ,और नाड़ी भी थक गयी
गतिमान इस काल में ,मेरी दुर्गति रुक गयी
अब कोई दूसरा इस पहेली को बूझता है
देखूं तनिक, उसे क्या हल सूझता  है.

    -- नरेन्द्र पन्त
  ११ फरवरी , २०११ 









Wednesday, January 26, 2011

डायरी - शब्दों की समाधि

बड़ी बहन के यह कहने पर कि उनके विचार डायरी में बंद हैं ..यूँ ही मुख से निकला कि ...


कोई नहीं ,अभी  बंद ही रहने दो उनको पन्नो में ,, बहुत चुभोई हैं कलम की नोक तुमने ,काले नीले आसुओं से भी तुम्हारा दिल नहीं पसीजा ?अब कराह के सो रहे हैं तो सोने दो. पर कभी खोल ले देख लेना किवाड़ उस डायरी के , नब्ज़ टटोल लेना उन् शब्दों की की जिंदा हैं या मर गए . पन्नो की चादर पीली पड़ जाए तो विचारो की नदिया का मुख उस ओर मोड़ लेना, चाहे कितनी धुलाई हो , चिपके रहेंगे वो शब्द , नहीं छोड़ेंगे अपनी जन्मभूमि को . यह वही जगह है जहाँ बरसो पहले तुम्हारे विचारो का  महाभारत  हुआ था , कलम की चोट से टांग दिया था तुमने इनको सूली पर . देखो कही मिल जाएँ सूखे आंसुओं  के निशान या नीले पड़ चुके घाव .  नहीं बदलेंगे रंग गिरगिट की तरह , बस बदल जायंगे उनको बांचने के मायने , स्वरों के पंख लेकर उड़ भी गए तो ,टकरा पड़ेंगे कान के पर्दों से , फिर से जी उठेंगे..और फिर से होगा महाभारत विचारों का .शायद उस दफा उनसे क्रांति का जन्म हो और विचारों कि वो कब्र शब्दों की समाधि में तब्दील हो जाए ..


             -- नरेन्द्र पन्त
               २६जनवरी ,२०११

Tuesday, January 25, 2011

नींबू और घडी

मुझे बचपन में ऊन का गोला बनाना बहुत अच्छा लगता था ,, वो भी जब जाड़े की धूप में पीठ सिक रही हो ..और एक डेक में नींबू सन रहा हो ,, व्यवधान बहुत आते थे और उन्  पर गुस्सा भी बहुत .. अब कितनी बार मैं घर अर्थात शीत कक्ष के भीतर जाऊं .. कभी पिसी भांग लेने , तो कभी छोटा वाला चाकू लेने ..छोटी कटोरी और ना जाने क्या क्या. भांग सुनते ही मैं दुविधा में पड़ जाता था  . सारे बड़े बुजुर्ग भांग को बुरा बताते थे पर   भांग की चटनी और भुनी हुई भांग मुझे मिठाई से भी ज्यादा प्रिय थी थी क्या है . तो हमें वो खाने क्यूँ दी जाती थी. खैर छोड़िये भांग की बातें , कही नशा ना  हो जाये लेखनी को. मेहनत का फल यहाँ मीठा कुछ क्षणों के लिए होता था ,, वो नींबू था सना हुआ नींबू ...खट्टा मीठा और थोड़ी देर धूप में रह जाए तो कड़वा भी..पर वो अनमोल था . कभी कभी उसमे माल्टा की मिलावट भी कर दी जाती थी और उनको लेने घर के भीतर ... नहीं मैं नहीं जाता था .. तब युद्ध  होता था छोटे भाई से .. और अंततः माताजी की वो पुचकार की " तू ही तो मेरा लाडला बेटा है .. ये तो कुछ सुनता ही नहीं ":.. जा बेटा.. और "अगली बार से नहीं जाऊंगा" ये धमकी देकर वो भीतर जाकर समान ले आता .. . कभी कभी उपरोक्त वर्णित युद्ध , महा युद्ध में परिवर्तित हो जाता और वो मेरे चिड़ाने पे वो मेरे हाथ पे अपने दांतों से घडी बना देता .. घडी तो थी पर सुईयां गायब .. युद्ध विराम के लिए आने वाली तमाचो की सेना पलक झपकते ही आँखों के सामने होती थी. उसके लिए इंतज़ार शायद ही कभी करना पड़ा हो .. और शायद उस घडी में सुइयां ना होने का ये भी कारण रहा हो. उन्  महासंग्रामो को लिपिबद्ध किया गया होता तो आज गिनती शायद हजारो में तो होती ही. हर एक घडी ने मुझे उस समय  के और करीब ला खड़ा किया .समय मेरे अन्दर जी रहा था , मेरे हाथ में . बस में होता तो ढक लेता ,, जाने ना देता उसे ..लेकिन समय रुका है क्या कही किसी के लिए. बस आज इन महानगरो में एकाकी भ्रमण करता अपने बाजू की घडी को टटोलता हूँ. घडी तो मिलती नहीं . बस हाथ आती है तो नब्ज़ जो हर पल एहसास कराती है कि अभी बाकी हैं धूल मिटटी , कालिख और आक्सीजन कि कुछ घूंटे ..वो सना हुआ नींबू और उसमे सना माँ का प्यार , पिताजी कि फटकार और भाई की ललकार अब कहाँ .
 --
नरेन्द्र पन्त
जनवरी २५,२०११