Wednesday, January 26, 2011

डायरी - शब्दों की समाधि

बड़ी बहन के यह कहने पर कि उनके विचार डायरी में बंद हैं ..यूँ ही मुख से निकला कि ...


कोई नहीं ,अभी  बंद ही रहने दो उनको पन्नो में ,, बहुत चुभोई हैं कलम की नोक तुमने ,काले नीले आसुओं से भी तुम्हारा दिल नहीं पसीजा ?अब कराह के सो रहे हैं तो सोने दो. पर कभी खोल ले देख लेना किवाड़ उस डायरी के , नब्ज़ टटोल लेना उन् शब्दों की की जिंदा हैं या मर गए . पन्नो की चादर पीली पड़ जाए तो विचारो की नदिया का मुख उस ओर मोड़ लेना, चाहे कितनी धुलाई हो , चिपके रहेंगे वो शब्द , नहीं छोड़ेंगे अपनी जन्मभूमि को . यह वही जगह है जहाँ बरसो पहले तुम्हारे विचारो का  महाभारत  हुआ था , कलम की चोट से टांग दिया था तुमने इनको सूली पर . देखो कही मिल जाएँ सूखे आंसुओं  के निशान या नीले पड़ चुके घाव .  नहीं बदलेंगे रंग गिरगिट की तरह , बस बदल जायंगे उनको बांचने के मायने , स्वरों के पंख लेकर उड़ भी गए तो ,टकरा पड़ेंगे कान के पर्दों से , फिर से जी उठेंगे..और फिर से होगा महाभारत विचारों का .शायद उस दफा उनसे क्रांति का जन्म हो और विचारों कि वो कब्र शब्दों की समाधि में तब्दील हो जाए ..


             -- नरेन्द्र पन्त
               २६जनवरी ,२०११

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