Sunday, March 13, 2011

"कालिख"

यूँ कलम उठा कर लिखने चला , 
स्याही ने पूछा मुझसे , क्यूँ भला 
विचारो को मुझमे डुबो रहे हो?
शर्म से पानी पानी न हो जाऊं.

मैंने भुलावा दिया कि, गिनते रह  
मेरे शब्दों की धड़कन, 
और बिखरा दी  काले अक्षरों में
मन की "कालिख".

                 --  
                 नरेन्द्र पन्त 
                १३ मार्च, २०११