Wednesday, August 15, 2012

"माँ तुझे सलाम"

माँ आज तुझे सलाम , कल करूँगा नीलाम,
सह लेगी अगले बरस की सलामी तक?
बदले आज़ादी के मायने , बचपन के लड्डू  से,
व्यंग में झुलसी जवानी तक.
कब तक भरम को गहराऊँ, साँसों को फुसलाऊ
तिरंगे की इस दो  दिनी रवानी पर.
बरसो इस नाव को खेकर,लहू के कई रंग लेकर
लो आ पहुंचे
उस गुलामी से इस गुलामी तक.
माँ , सह लेगी अगले बरस की सलामी तक ?

-- नरेन्द्र पन्त
15 अगस्त , 2012 

Sunday, June 24, 2012

इश्क

न कर इश्क पर बनने दे ऊन को गोला ,
इक स्वेटर में बुन जायेंगे ,
तू दिल के पास रहना ,मैं हाथ के किनारे 
कभी किसी दिन, कोई गलती तो होगी हाथ से 
जब मैं पोंछ लूँगा तेरे तन पर पड़े वो छींटे.
या चबा लेगा दांतों तले मुझे वो नन्हा 
फिर कितनी जोर से धड़का ये दिल ,
जब मालूम होगा, तू इश्क को खुदा मानेगी.

-- नरेन्द्र पन्त  

Friday, June 22, 2012

सवेरा

# जून 22, 2012  :

          आँखों में सोयी हुई नींद , ताज़ा अखबारी कागज़ की महक और बासी खबरे , अब लुट जाने को बेताब हवा के झोंको में तैरते वो रात की रानी के चंद प्यादे जो सो नहीं पाए और कूद गए , उन्हें जमीन से बीनती पड़ोस वाली दादी , या फिर लाठी से डाल  को झुकाते वो मिस्टर कपूर , बाज़ की सी तेज़ी से चुन लेते दो फूल और सफ़ेद बुशर्ट की जेब में बंद कर लेते उनकी खुशबू . किताबो से भरा बस्ता लटकाए वो मासूम , आजकल सुबह स्कूल जाने से पहले  नहाते नहीं  ,ठण्ड बहुत है. मकड़ी के जाल अपनी आँखों से हटाते ,माँ , बाप , बेटा तीनो बस्ता लटकाए हैं और हाथ में एक एक टिफिन पकडे निकल पड़े हैं घर से. पड़ोस के मिस्टर श्रीकांत आज पहली बार जिम होकर आये हैं और ऊंची आवाज़ में  कसरत के फायदे गिना रहे हैं , टीनू अपने पिताजी की चप्पल पहने  फट फट की आवाज़ करता दौड़ रहा है, मौसम ऐसा है  कि बंगलोर में कश्मीर का मज़ा आ रहा है , और मैं अपने घर का दरवाजा खोले अखबारी खबरों का अचार बना रहा हूँ , साथ ही इन सभी लोगो की घूरती नजरो का शिकार बन रहा हूँ , शायद नाराज़ हैं ये .. लेकिन कौन कहता है कि "नाराज़ सवेरा है "?


Saturday, April 28, 2012

collaze -"celebration"-- @ work


Tuesday, April 17, 2012

"अटल"

नहीं व्यर्थ, विश्वास अटल ,
फेरे में आज ,चकित क्यूँ कल,
सुलगा दी माटी , भाग लिखा 
आजन्म सवांरा मेरा कल.

तोड़ रहे , बन आज अतिथि,
जीवन वट से दिन की पाती,
और सुखाते खुद ही उसको
गीली घास न पाए जल.

अगनित पल ले लो, जोड़ घटा लो ,
यत्न करो, सच ना झूठे,
गर विदा हुए तुम ,जग अनाथ हो ,
और धूमिल ये आते कल.

जिस जिस पल मैं थम जाऊं
रहूँ मैं माया में व्याकुल
एक पोखरन मुझे बनाना
कर देना विस्फोट "अटल"

-- नरेन्द्र पन्त

Friday, April 6, 2012

निम्मू


पोरी बेर जब घर जा रोछी मु ,, तब खा हो .. और आनद आ गोछी

Friday, March 30, 2012

" पतंगे के पर "

कहाँ छिपी धड़कन ,टटोलू कलाई किसकी
कहाँ छुपा वो तन ? 
जो बादलो के आईने में ,
खुद को उकेरता , और बरस जाता ,
दोपहर की  धूल  भरी आंधी के बाद .
जिसकी आखिरी सांस का स्वर गूंजता ,
गरजती इस बदली को , मात देता .

सबक गीता का , पढ़ लिया , गुन लिया 
पर  व्यर्थ बुझ जाता क्यूँ , ये ज्ञान का तारा
जब सांस का दीपक , विदा करता लौ को 
पतंगे के परों पर बिठा. 
अनजान नगर या  मायके को ?

रीत के विपरीत है ,क्षण भर विस्मित हूँ ,
और व्याकुल भी , उत्सुक भी कि
बादल फिर घिर आये हैं.
पतंगे के पर निकल आये या नहीं ?

 -- नरेन्द्र पन्त 









Monday, March 19, 2012

"आम की पत्ती "

अम्मी , आम बना दो , होम वर्क दिया है टीचर ने , ये कहते हुए रिजवान ने बस्ता फेका और कटे पेड़ की तरह पसर गया बिस्तर पर .फिर से आँखों में वो धुंआ घाने लगा , क्यूँ हर शाम यूँ ही मायूस होती थी ये समझने की न उम्र थी और न ही चाहत. अम्मी ने एक बार उस उर देखा और वो फिर से जुगत में जुट गयी अपने लाडले के  पसंदीदा पराठे बनाने में .

आधे घंटे बाद पसोद का आरिब आया और ले गया रिजवान को क्रिकेट खेलने, अम्मी ने धीरे से कदम बढ़ाये और बालकोनी में जाकर दूर से आते चाँद की ओर देखा , और मुड़ के देखा गली के दूसरे छोर को जहाँ उसका तारा टिमटिमा रहा था . पास में हज़रत मियाँ अपनी दूकान के तालो को बार बार खोलते बंद करते , और दुकान के सामने कैरम खेल रहे लोगो के साथ मिलकर मुल्क के हालातो की चर्चा , उम्र के इस पड़ाव पर भी उनको अपने दुकान मे रखी सिर्फ ४ चूरन की बोतलों से इतना लगाव था की कोई चुरा ले तो कब्र से भी बरछी चलाकर कलेजा निकाल लें ,साथ ही बच्चो से इतना प्यार कि सुबह सुबह गली के हर बच्चे को चूरन की एक गोली बांटी जाती , बच्चो उनको प्यार से चूरन मियाँ कहते, और वो ठहाके लगाकर बच्चो का सारा प्यार अपने चूरन की डिबिया में समेट लेते , सिर्फ उनको तलब किया जाता जब उनकी बेगम को लोग चूरन मियाँ की बेगम कहकर पुकारते . वो भी बस दो पल की अदा होती , फ़र्ज़ पूरा करती थीं . गली के बच्चो को बड़ा प्यार था चूरन मियाँ से . आधे घंटे में मियां के ताले बंद हो ही गए , इतने में अल्लाह के नूर की इबादत से सारा समां गूँज उठा .

ये बच्चो के लिए भी एक अलार्म की तरह काम करता , और क्रिकेट का मैच वही रुक जाता .थोड़ी झड़प होती जरूर , कोई न भी लड़े आरिब जरूर लड़ता , अमूमन  ऐसा होता था की उसकी  बैटिंग  सबसे बाद में आती , सबसे छोटा था वो गली में. आज फिर रिजवान उसे समझा बुझा कर ले आया घर.

रिजवान ने स्टम्प से दरवाज़े पर ठोकर मारी और अन्दर घुसकर बोला ,, अम्मी कान मत मरोड़ो टीवी के ,एक नंबर पर आता है न .. और झट से खुद सेट कर दिया और बैठ गया गालो पर हाथ लगा कर .. मौका अम्मी भी नहीं चूकी , हाथ कौन धुलेगा , जाओ पहले हाथ मुह धुलो फिर टीवी बंद और होमवर्क पूरा करो .

सिर्फ इतवार को रिजवान को टीवी देखने की इज़ाज़त थी , वो भी सुबह नौ बजे से ग्यारह , और शाम को ४ बजे की पिक्चर . मन मसोस कर वो उठा और स्टम्प्स को खाट के नीचे फेका . मुहं धुलते हुए चिल्ला कर बोला , अम्मी क्या बनाया है , बहुत भूख लग रही है ..कितने दिन से आपने सेवियां भी नहीं बनायीं .कल बना दूंगी मेरा बाबा और समेत लिया उसे आँचल की छावं में, अभी होमवर्क करो .

रिजवान पढने में बहुत तेज़ था लेकिन उसको चित्रकला समझ में नही आती , बाकी होमवर्क वो स्कूल में ही पूरा कर लेता था , अब बचा था सिर्फ आम .अम्मी बनवा दो न ,प्लीज़, अगली बार से मैं खुद बनंगा , लेकिन अम्मी ने ठान ली थी की ,, आज वो नहीं बनवाएंगी,, उन्हें पता था की आज नहीं सीखेगा तो कभी नहीं सीख पायेगा . निकालो आर्ट वाली कॉपी. .. हूव्व .. अम्मी नीद आ रही है .. बहाने शुरू हो गए थे ,, लेकिन दो पल बाद अम्मी का हाथ नन्हे हाथो को घेरे कोरे कागज़ पर लकीरे खींच रहा था. थोड़ी कोशिश के बाद आम बन गया , और ख़ुशी से रिजवान ने अम्मी के गालो को चूम लिया ,, अब पत्ता बनायेंगे आम का .. और लकीरे खींचती  चली गयी. और ये बन गयी पत्ती ..
,, ये कहते कहते , अचानक से रिजवान का हाथ हट गया और अम्मी का हाथ फिसलता हुआ पूरे पन्ने पर लाइन खींचा चला गया ... अम्मी को समझ आया कि कुछ गलत हो गया ,, रिजवान बोला अम्मी आपने तो आम वाली पतंग बना दी ,, ये इतनी लम्बी डोर .. इस पन्ने से उस पन्ने तक ,, अम्मी की आंखे छलक आई ,, रिजवान आंसों पोछते हुए बोला , रो मत अम्मी मैं बड़ा होकर आँखों  का डॉक्टर बनूँगा और सबसे पहले तेरी आँखें ठीक करूँगा ..अम्मी ने उसे गले से लगा लिया और बोली चल पराठे बनाये हैं , ठन्डे हो जायेंगे..फिर सोना भी तो है.






Friday, March 9, 2012

रंग

रुक और ताने दे
गिरह में बाँध ले तिनके सुनहले
यूँ तोड़ ले ,जो जोड़ने की गुत्थी सुलझती नहीं,
मुख मोड़ ले उस दाग से जो हैं रंगीले
रंग गिन इन बादलों के,
चुनरी को रंगने के बाद
और पोत दे इस आसमाँ  को
बेरंग इस मन की तरह.
सबसे रंगीला छजता है ,जो ,
छिड़क दे वो रंग ,इस आसमाँ को
चादर बना .  

-- नरेन्द्र पन्त 
  

Friday, February 10, 2012

सुबह

एक पल में मौन,
वो साया सा , सूख गया आम के आचार की गुठली
में वो बात नहीं अब , फिर से आज मूंग की दाल ,
क्या बीमार हूँ मै ? 
या हाल के झटके से उबरा नहीं अभी ,लो आ गया नया अखबार , 
एक और सुबह को चाय में डुबो लूँ , क्यूँ ? 
अरे बता दूँ पानी को कि जिंदा हूँ , तू गरम सही मै नींद में ,
नरम कर लूँ दो और लम्हे , ठंडा न हो , इस भागती सुबह में
धड़कन को रोक ले , घडी के दो हाथ या दो पाँव , जकड ले .
अरे कल  तेरी मनमानी का आखिरी दिन था ,
अब वादियाँ मेरी रजाई के मोड़ में 
और सीमायें मेरे सपनो के छोर में छुपी हुई ,इस हँसी के पीछे राज क्या ? ये सपना क्या  ...


ओह्ह ..
मम्मी उठ गया मैं , पानी मत डालो ,, चाय यही रख दो ..
-- 
नरेन्द्र पन्त 
फरवरी , २०१२

Thursday, January 26, 2012

James Lovelock is a futurologist, and so was Jules Verne

lovelock to verne - long live fedora

Tuesday, January 24, 2012

"अनकही बातें , अधूरे ख्वाब"

१:
लिखा पढ़ी के चक्कर में 
जो लग गयी हाथ स्याही 
रंग डाली किस्मत 
अब फेर कर पानी
कौन (सा) रंग खोजू मैं .
क्यूँ  बूझूं अगला कारनामा क्या रंग होगा ?

२: 
तू उस पहाड़ी पर , मैं नदी के इस किनारे चीखता ,
चलो पतंग उड़ायें 
हम न मिलें,
डोर को तो मिलने दो .
कट जाएगी? क्या?
यही इश्क है
नहीं तो , 
क्यूँ दुनिया कटी पतंग के पीछे भागती देखी?

३:

वो दुबकी , उस झाड के पीछे 
मेरे हाथ में लगे कांटो में 
इन्द्रधनुषी रंग खोजती ,
कुछ दिन पहले का वाकया है 
जाने कौन से कोने में जा छुपी,
अब किताब के पन्ने  भी पीले 
और सुबह की धूप भी 
अब और लहू में कितने रंग मिलाऊं
वो सफ़ेद रंग कहाँ से लाऊं?

( मेरे प्यारे खरगोश daisy  की याद में . मिस यू  daisy  ) 



-- नरेन्द्र पन्त
( जनवरी २०१२)

Sunday, January 15, 2012

"बदली" की बदली

मेरे हिस्से के बादल,
अँधेरे से लीप दे धूप, 
कोयल को पता न चलने दे उजालों के वो गीत ,
जो बरसो मै आखिरी पन्ने सी , 
हाथों की लकीरों में कुरेदता रहा.
रख ले भर कर जो आंसू आज टपके हैं ,
दूर समंदर किनारे पहाड़ी से जा गले लग ,
सुना गुस्ताख ने बहुत नमक बटोर लिया किनारे पर. 

--
नरेन्द्र पन्त 
१५ जनवरी , २०१२

Saturday, January 14, 2012

"बेनाम बदलाव"

रख दूं एक सांस और ,
तोल
ले तराजू पे, तोड़ दे ये मापने का मायना.
बदलने दे धडकनों को कतारें,
लुट जाने दे उस पोटली में बंधे 
मूंगफली के दो दाने,
बीते बरस के वो दाड़िम,
अब खट्टे रहे नहीं ,वो
रिश्ते जो कभी नासूर हुआ करते थे.

---
नरेन्द्र पन्त
१४ जनवरी , २०१२



Friday, January 6, 2012

बेमौसमी बसंत

अब तेरा ख़त पढ़कर गुनकर ,
मैंने अनछुआ अंकित किया .
छेड़कर अमिया की बातें,
कोयल को आतंकित किया .

घिरी हुई  है वो इस नगरी में,
 तिनको की दीवारों से,
जब बेमौसमी आम की बोरों ने 
माली को शंकित किया.

--
नरेन्द्र पन्त
६ जनवरी , 2012