Friday, January 6, 2012

बेमौसमी बसंत

अब तेरा ख़त पढ़कर गुनकर ,
मैंने अनछुआ अंकित किया .
छेड़कर अमिया की बातें,
कोयल को आतंकित किया .

घिरी हुई  है वो इस नगरी में,
 तिनको की दीवारों से,
जब बेमौसमी आम की बोरों ने 
माली को शंकित किया.

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नरेन्द्र पन्त
६ जनवरी , 2012
 


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