Sunday, January 15, 2012

"बदली" की बदली

मेरे हिस्से के बादल,
अँधेरे से लीप दे धूप, 
कोयल को पता न चलने दे उजालों के वो गीत ,
जो बरसो मै आखिरी पन्ने सी , 
हाथों की लकीरों में कुरेदता रहा.
रख ले भर कर जो आंसू आज टपके हैं ,
दूर समंदर किनारे पहाड़ी से जा गले लग ,
सुना गुस्ताख ने बहुत नमक बटोर लिया किनारे पर. 

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नरेन्द्र पन्त 
१५ जनवरी , २०१२

2 comments:

Richa said...

hmmmm. mann to bada hai almora wapas jaane ka.. sahi??

narendra pant said...

are tu samjhi nahi kavita ka bhav