Friday, February 10, 2012

सुबह

एक पल में मौन,
वो साया सा , सूख गया आम के आचार की गुठली
में वो बात नहीं अब , फिर से आज मूंग की दाल ,
क्या बीमार हूँ मै ? 
या हाल के झटके से उबरा नहीं अभी ,लो आ गया नया अखबार , 
एक और सुबह को चाय में डुबो लूँ , क्यूँ ? 
अरे बता दूँ पानी को कि जिंदा हूँ , तू गरम सही मै नींद में ,
नरम कर लूँ दो और लम्हे , ठंडा न हो , इस भागती सुबह में
धड़कन को रोक ले , घडी के दो हाथ या दो पाँव , जकड ले .
अरे कल  तेरी मनमानी का आखिरी दिन था ,
अब वादियाँ मेरी रजाई के मोड़ में 
और सीमायें मेरे सपनो के छोर में छुपी हुई ,इस हँसी के पीछे राज क्या ? ये सपना क्या  ...


ओह्ह ..
मम्मी उठ गया मैं , पानी मत डालो ,, चाय यही रख दो ..
-- 
नरेन्द्र पन्त 
फरवरी , २०१२