Monday, March 19, 2012

"आम की पत्ती "

अम्मी , आम बना दो , होम वर्क दिया है टीचर ने , ये कहते हुए रिजवान ने बस्ता फेका और कटे पेड़ की तरह पसर गया बिस्तर पर .फिर से आँखों में वो धुंआ घाने लगा , क्यूँ हर शाम यूँ ही मायूस होती थी ये समझने की न उम्र थी और न ही चाहत. अम्मी ने एक बार उस उर देखा और वो फिर से जुगत में जुट गयी अपने लाडले के  पसंदीदा पराठे बनाने में .

आधे घंटे बाद पसोद का आरिब आया और ले गया रिजवान को क्रिकेट खेलने, अम्मी ने धीरे से कदम बढ़ाये और बालकोनी में जाकर दूर से आते चाँद की ओर देखा , और मुड़ के देखा गली के दूसरे छोर को जहाँ उसका तारा टिमटिमा रहा था . पास में हज़रत मियाँ अपनी दूकान के तालो को बार बार खोलते बंद करते , और दुकान के सामने कैरम खेल रहे लोगो के साथ मिलकर मुल्क के हालातो की चर्चा , उम्र के इस पड़ाव पर भी उनको अपने दुकान मे रखी सिर्फ ४ चूरन की बोतलों से इतना लगाव था की कोई चुरा ले तो कब्र से भी बरछी चलाकर कलेजा निकाल लें ,साथ ही बच्चो से इतना प्यार कि सुबह सुबह गली के हर बच्चे को चूरन की एक गोली बांटी जाती , बच्चो उनको प्यार से चूरन मियाँ कहते, और वो ठहाके लगाकर बच्चो का सारा प्यार अपने चूरन की डिबिया में समेट लेते , सिर्फ उनको तलब किया जाता जब उनकी बेगम को लोग चूरन मियाँ की बेगम कहकर पुकारते . वो भी बस दो पल की अदा होती , फ़र्ज़ पूरा करती थीं . गली के बच्चो को बड़ा प्यार था चूरन मियाँ से . आधे घंटे में मियां के ताले बंद हो ही गए , इतने में अल्लाह के नूर की इबादत से सारा समां गूँज उठा .

ये बच्चो के लिए भी एक अलार्म की तरह काम करता , और क्रिकेट का मैच वही रुक जाता .थोड़ी झड़प होती जरूर , कोई न भी लड़े आरिब जरूर लड़ता , अमूमन  ऐसा होता था की उसकी  बैटिंग  सबसे बाद में आती , सबसे छोटा था वो गली में. आज फिर रिजवान उसे समझा बुझा कर ले आया घर.

रिजवान ने स्टम्प से दरवाज़े पर ठोकर मारी और अन्दर घुसकर बोला ,, अम्मी कान मत मरोड़ो टीवी के ,एक नंबर पर आता है न .. और झट से खुद सेट कर दिया और बैठ गया गालो पर हाथ लगा कर .. मौका अम्मी भी नहीं चूकी , हाथ कौन धुलेगा , जाओ पहले हाथ मुह धुलो फिर टीवी बंद और होमवर्क पूरा करो .

सिर्फ इतवार को रिजवान को टीवी देखने की इज़ाज़त थी , वो भी सुबह नौ बजे से ग्यारह , और शाम को ४ बजे की पिक्चर . मन मसोस कर वो उठा और स्टम्प्स को खाट के नीचे फेका . मुहं धुलते हुए चिल्ला कर बोला , अम्मी क्या बनाया है , बहुत भूख लग रही है ..कितने दिन से आपने सेवियां भी नहीं बनायीं .कल बना दूंगी मेरा बाबा और समेत लिया उसे आँचल की छावं में, अभी होमवर्क करो .

रिजवान पढने में बहुत तेज़ था लेकिन उसको चित्रकला समझ में नही आती , बाकी होमवर्क वो स्कूल में ही पूरा कर लेता था , अब बचा था सिर्फ आम .अम्मी बनवा दो न ,प्लीज़, अगली बार से मैं खुद बनंगा , लेकिन अम्मी ने ठान ली थी की ,, आज वो नहीं बनवाएंगी,, उन्हें पता था की आज नहीं सीखेगा तो कभी नहीं सीख पायेगा . निकालो आर्ट वाली कॉपी. .. हूव्व .. अम्मी नीद आ रही है .. बहाने शुरू हो गए थे ,, लेकिन दो पल बाद अम्मी का हाथ नन्हे हाथो को घेरे कोरे कागज़ पर लकीरे खींच रहा था. थोड़ी कोशिश के बाद आम बन गया , और ख़ुशी से रिजवान ने अम्मी के गालो को चूम लिया ,, अब पत्ता बनायेंगे आम का .. और लकीरे खींचती  चली गयी. और ये बन गयी पत्ती ..
,, ये कहते कहते , अचानक से रिजवान का हाथ हट गया और अम्मी का हाथ फिसलता हुआ पूरे पन्ने पर लाइन खींचा चला गया ... अम्मी को समझ आया कि कुछ गलत हो गया ,, रिजवान बोला अम्मी आपने तो आम वाली पतंग बना दी ,, ये इतनी लम्बी डोर .. इस पन्ने से उस पन्ने तक ,, अम्मी की आंखे छलक आई ,, रिजवान आंसों पोछते हुए बोला , रो मत अम्मी मैं बड़ा होकर आँखों  का डॉक्टर बनूँगा और सबसे पहले तेरी आँखें ठीक करूँगा ..अम्मी ने उसे गले से लगा लिया और बोली चल पराठे बनाये हैं , ठन्डे हो जायेंगे..फिर सोना भी तो है.






3 comments:

Vijay Shankar Upreti said...

Atyant vishishth. Aise hi likhte raho.

narendra pant said...

dhanyawaad :)

Prasenjit Choudhury said...

I appreciate the fact that in all of our myriad work-life-girlfriend-friend-enemies-frenemies....no matter what happens, our mothers will always side with us.

Awesome Mr. Pant :)