Sunday, June 24, 2012

इश्क

न कर इश्क पर बनने दे ऊन को गोला ,
इक स्वेटर में बुन जायेंगे ,
तू दिल के पास रहना ,मैं हाथ के किनारे 
कभी किसी दिन, कोई गलती तो होगी हाथ से 
जब मैं पोंछ लूँगा तेरे तन पर पड़े वो छींटे.
या चबा लेगा दांतों तले मुझे वो नन्हा 
फिर कितनी जोर से धड़का ये दिल ,
जब मालूम होगा, तू इश्क को खुदा मानेगी.

-- नरेन्द्र पन्त  

Friday, June 22, 2012

सवेरा

# जून 22, 2012  :

          आँखों में सोयी हुई नींद , ताज़ा अखबारी कागज़ की महक और बासी खबरे , अब लुट जाने को बेताब हवा के झोंको में तैरते वो रात की रानी के चंद प्यादे जो सो नहीं पाए और कूद गए , उन्हें जमीन से बीनती पड़ोस वाली दादी , या फिर लाठी से डाल  को झुकाते वो मिस्टर कपूर , बाज़ की सी तेज़ी से चुन लेते दो फूल और सफ़ेद बुशर्ट की जेब में बंद कर लेते उनकी खुशबू . किताबो से भरा बस्ता लटकाए वो मासूम , आजकल सुबह स्कूल जाने से पहले  नहाते नहीं  ,ठण्ड बहुत है. मकड़ी के जाल अपनी आँखों से हटाते ,माँ , बाप , बेटा तीनो बस्ता लटकाए हैं और हाथ में एक एक टिफिन पकडे निकल पड़े हैं घर से. पड़ोस के मिस्टर श्रीकांत आज पहली बार जिम होकर आये हैं और ऊंची आवाज़ में  कसरत के फायदे गिना रहे हैं , टीनू अपने पिताजी की चप्पल पहने  फट फट की आवाज़ करता दौड़ रहा है, मौसम ऐसा है  कि बंगलोर में कश्मीर का मज़ा आ रहा है , और मैं अपने घर का दरवाजा खोले अखबारी खबरों का अचार बना रहा हूँ , साथ ही इन सभी लोगो की घूरती नजरो का शिकार बन रहा हूँ , शायद नाराज़ हैं ये .. लेकिन कौन कहता है कि "नाराज़ सवेरा है "?