Friday, September 20, 2013

" जीजिविषा "


पलों की जंग, कुछ झुलसे कुछ जीते पल,
फिर एक पहेली , फिर बूझू उसका हल ।
लाज रखूं  ताक पर , देख कर जीजिविषा
छुपते हुए सूरज शर्म से हुए लाल ।
इठलाता, हाथ पर पत्ती से छाप मारूं,
बुनूं  लकीरों के मुहाने पर कंटीले जाल ।

दिन और रात की बदलती पाली,
लुका-छुपी का खेल, मैदान भी खाली ।
हारूँ बरस  की बाज़ी पर कदम बढाकर,
नोंच लूँ उस पार से इस पार एक साल ।
भूलूं सतरंगी जीवन का छोर आखिर,
कोरे कागज़ पर सफ़ेद स्याही का कमाल ।

--
नरेन्द्र पन्त
२० सितम्बर , २०१३

Sunday, January 13, 2013

ये क्या बवाल ?

जो आस इस मन की, उस पहेली के हल सी
'बूझो बंजारे की धरती पर, लहलहाती फसल सी '
एक बरस का जीवन कपास की खेती सा ज्यूँ
नींद में हैं बादल, न पूछो उनका हाल क्यूँ ?
खुद को जवाब दूं, करूँ सवालो पर सवाल
उफ़ ये क्या बवाल, उफ़ ये क्या बवाल !!

कलम की नोक तोडूं , या हवा को साथी कर
उड़ने दूँ काले गुबार को , सफ़ेद पन्नो की तरह ।
रखूँ महफूज़ गुल को गुलज़ार होने दूं क्यूँ ?
किससे करूँ दुआ, कश्ती के पार होने तक ।
हाथी घोड़े ऊँट की बाज़ी और मेरी कछुवे की चाल
उफ़ ये क्या बवाल, उफ़ ये क्या बवाल !!

--
नरेन्द्र पन्त
13 जनवरी , 2013