Sunday, January 13, 2013

ये क्या बवाल ?

जो आस इस मन की, उस पहेली के हल सी
'बूझो बंजारे की धरती पर, लहलहाती फसल सी '
एक बरस का जीवन कपास की खेती सा ज्यूँ
नींद में हैं बादल, न पूछो उनका हाल क्यूँ ?
खुद को जवाब दूं, करूँ सवालो पर सवाल
उफ़ ये क्या बवाल, उफ़ ये क्या बवाल !!

कलम की नोक तोडूं , या हवा को साथी कर
उड़ने दूँ काले गुबार को , सफ़ेद पन्नो की तरह ।
रखूँ महफूज़ गुल को गुलज़ार होने दूं क्यूँ ?
किससे करूँ दुआ, कश्ती के पार होने तक ।
हाथी घोड़े ऊँट की बाज़ी और मेरी कछुवे की चाल
उफ़ ये क्या बवाल, उफ़ ये क्या बवाल !!

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नरेन्द्र पन्त
13 जनवरी , 2013

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