Wednesday, December 31, 2014

"मैं यूँ चला "

विगत वर्ष के थक जाने पर , आई नए साल की बारी 
न समझू ये बढ़ती है , या घटती जीवन की पारी 
अभी पतझड़ को थामे , मैं करुँ आग का अंदेशा
पर उड़ते पन्ने , उड़ती स्याही , कैसे भेजूँ संदेशा ।
शब्दों की डोरी में भावों को उलझाता,
टालूं  ये दिन, महीने, साल की बला,
मैं यूँ चला , मैं यूँ चला ।

इस सर्दी को , धूप की चादर की मांग,
कृषक के नयनो को , खादर की मांग ।
कोई कहे नदिया से , बिन बाढ़ के इस साल तू ,
माटी को सोना करने को बाण चला । 
सारी दुविधाओं पर एक-एक कील ठोकता,
यूँ दिखलाऊ नव एकत्व की कला,
मैं यूँ चला ,मैं यूँ चला।  

-- 
नरेंद्र पंत
३१ दिसंबर , २०१४।

4 comments:

TheInsolent said...
This comment has been removed by the author.
valencelectron said...

पंतज्यू कविताओं में गहराई आ गयी है अब खूब

सुशील कुमार जोशी said...

नव वर्ष शुभ हो । बहुत सुंदर रचना ।

narendra pant said...

dhanyawaad sir.