Saturday, August 22, 2015

काश..

मन है एक बार जुड़ जाऊं , ये हर सुबह वही ख़त ख़त की आवाज़ , वही पीली धूप और उसमे पके हुई ईट से पीले काले चेहरे , अब ऊबने से लगे हैं . फिर से मैं जाकर बैठ गया उस  गली के मोड़ पर , दिन को मेरी किस्मत से रश्क था , जो  आज भी वो लेकर आ गया तपता सूरज , एक बूँद  भी जब तक है ,,वो चमकते रहेगा ,,सूख सी गयी है जान ,, खून पसीने की क्या मजाल की आँख उठा कर देख लें . चुपचाप गिरते रहे सालो से जमीं पर , उनके साथ ही बह गए , सारे सवाल और कुछ जवाब . किस्से से कहानियाँ और कहानी से किवदंतियां बनते हुए देखा मैंने उन बूंदों को , चाह्ह्ये खून हो , पसीना हो या पानी ,, क्या फरक पड़ता है , किसे परवाह है ,, कुछ भी गिरे ,, मिटटी गीली होती है कीचड  बनता है ,, और  दुनिया लाँघ कर चली जाती है , अब इसमें भी अगर वाद विवाद होने लगा तो समय बर्बाद हो जायेगा न , उन लोगो का जो देश का भाग्य लिखने गद्दी पर बैठे हैं , मैं कोई खूबसूरत बला थोड़े ही हूँ , जो वो मुझे अपने मोबिल पर भी देखेंगे , मैं तो यूँ जमीन से जुड़ा हूँ की उनकी मोटर कार की पूरी खुली खिड़की से भी नहीं दीखता , पास भी आकर देखे तो उसकी तोंद आड़े आ जाती है ,, मैं तो  मछ्छर  हुआ जी ,, ये कहते कहते दीनू रुक गया .. दूर से कोई आवाज़ लगा रहा था ..

चलो जी ,, चलें .. आ गया न्योता ...अ ओ मुना .. उठा जा ये ,, अभी तक ऊँघ  रहा है .. चावल की  बोरी जैसा .. हिल थोडा .. अपनी तो शाम की रोटी जा जुगाड़ हो गया

.. दीनू यहाँ आ ,,ये आते की बोरी मास्टर जी के यहाँ पहुंचा आ , ले ये पर्ची , इसमें लिखही घर का पता,यह कहते हुए लालाजी ने यूँ जोर से गरज़ना की , की मुन्ना की भी नीद खुल गयी .. बड़ी गैस है ,, पेट मलते हुए लालाजी लेट गए गद्दी पर .  मालिक हमे पढना कहाँ आये ,  आप कान मे फूक दो ,, हम याद कर लेंगे .. दो कदम पीछे हटते हुए दीनू बोला . अच्छा इधर आ , ये था तो न्योता पास आने का , पर मन को संदेह था की ,, भोपल्की तरह मैं गैस त्रासदी का शिकार न हो जाऊं . सही कहा बुजुर्गो ने कि अपने आँख , कान खुले रखो , किसी ने नाक का ज़िक्र नहीं किया. मैं ठहरा अनपद ग्वार लेकिन लकिन इतनी अक्कल तो थी ही, कान के परदे बड़े कर और नाक कि गुफाएं छोटी .. हाँ मालिक बोलिए .. उनके हाथ में पर्ची थमा दी .

एक दिन पड़ोस वाले भीकू की बिटिया समझा रही थी .. कि हम सांस में आफ सीजन लेते हैं , उसदिन तो लगा कि अपने अन्दर मशीन बड़ी सही वाली लगी है , हवा से भी हवा निकाल कर अन्दर करती है .. लेकिन फिलहाल फेफड़ो में जो भी था उसमे ऑफ सीजन  की कमी लग रही थी . मन में दीनू ने सोचा ये हवा के चक्कर में कहाँ रोटी को भूल गया .. हवा से पेट थोड़े ही भरता है . और उठा ली बोरी अपनी पीठ पर.

मास्टर जी का डेरा गाँव के दूसरे छोर पर  पाठशाला से कोई ५० कदम की दूसरी पर था. ये लम्बी सुनहली दाड़ी थी उनकी की छोटी चिड़िया तो घोसला बना के निकल जाये ,उसको खबर हुए बिना। गाँव वाले उनकी बड़ी इज्ज़त करते थे , मास्टर जी ने अपना जीवन बच्चो को पढ़ने के लिए लगा दिया था।  कभी पाठशाला से हटकर कुछ दखा ही नहीं , उम्र ढल रही थी पर आज भी वो उसी जोश के साथ पढ़ाते और यूँ बच्चो को साधते जैसे की इक्कीस की दहलीज़ अभी लांघी हो. किताबो और बच्चो से  से इतना प्यार कि विवाह उनको व्यवधान लगा . यूँ तो मैं कई सालो से लाला के यहाँ काम कर रहा हूँ लेकिन आज पहली बार उनके घर जा रहा हूँ.
याद आ गए वो दिन जब मास्टर जी मुझे धूप में खड़ा होने कि सजा देते थे , तब सबक सीख लिया होता तो आज शायद धूप में न डोलना पड़ता कभी इस गली कभी उस गली.  जैसे जैसे कदम रास्ता नाप रह थे , मन में एक टीस उठा रही थी कि काश . ..

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