Saturday, August 22, 2015

-------------- कतरनें -------------------

" शून्य "

शून्य लिखा था , सुना था , देखा था,
आज महसूस किया है,
इसका ओर ही छोर है , ये चमके तो शोर है,
चुपके से जुड़ता , ये बड़ा चोर है। 
जुड़ा है गुणा जैसा,इसका ये प्यार कैसा,
खुद को बढाकर , मिटा गया मुझे ऐसा। 
जा , कहीं  और जुड़ , कहीं  और चमक
किसी और किताब का तकिया बना,
खुश ? अब तू और मैं बराबर ,तेरा मेरा हिसाब बराबर ।
 

" क्या शाम जलेगी ? "

चलो पानी का टीला बनाये ,
रेत अब रही कहाँ,
खून से धरती सींचे ,
बारिश में वो बात कहाँ,
चलो ये पन्ने जलाये , कही तो आग लगेगी
जितना मैं जल रहा हूँ , क्या कभी कोई शाम जलेगी ?


" चौराहा "

मैं राहों को काटता, दिशाओं को बांटता,
अकेला खड़ा रहता, धूल चाटता। 
हाथ फैलाये कही और भी खड़ा मैं,परिवार में अपने ,हर एक से जुड़ा मैं। 
गाडी हो या नाड़ी मुझे  ढूंढती है ,
ये पूरी दुनिया मेरे चारों ओर घूमती है।
हर कोई परेशान रहता मुझे देखकर,
सिर्फ ये बत्तियां मुझे देख झूमती हैं।

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नरेंद्र पंत
२२ अगस्त , २०१५