Thursday, October 13, 2016

कहानियां

कुछ लिखने बैठा , कलम तोड़कर
भावो की गर्दन मरोड़ कर;
बीते बरस की सारी कहानियां,
खुद सुनने आयी ख्वाब छोड़ कर।

अब इन्हें लिखू या इन्हें सुनाऊ ,
जाने दूं या बैठ मनाऊं ;
पर किसकी बारी , ये मारामारी
उफ़ , पहले किसको दफनाऊं।

फिर बरसो बाद उठेंगी ये,
दस्तक देने उन गलियों में;
जो छूट गयी पर याद रही,
उन मूंगफली की फलियों में।

जेबें भर ली , जेबें खाली
सपने झड़ते डाली डाली;
और कविता बनी कहानी की
फिर भी पूरा पन्ना खाली।

अब टूटी कलम को कैसे मनाऊं,
कहाँ से बेरंग स्याही लाऊं,
असमंजस में उलझा फिरता,
कुछ भी बक बक करता जाऊं।

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नरेंद्र पन्त
अक्टूबर २०१६