Tuesday, January 9, 2018

" बैचैन अब ये ख्वाब हुए "


पुराने घर के छज्जे पर लटके मधुमक्खी के छत्ते ,
निगरानी करते फूलों की अब,
जाने कब मुरझा जाये ये अरसा हुआ बरसात हुए,
बरसों किताब में सहेजे चिड़िया के पंख, 
अब उड़ने को बेताब हुए ,बैचैन अब ये ख्वाब हुए । 

रेत के दरिया में डूबी सफर की उम्मीदों के,
जम जाने की खाव्हिश में,
फूलों के बागों में जब, कांटो से दो हाथ हुए,
गुमसुम आंखो से बहते सपने, दीवारों से टकरा कर,
राहों के हमराह हुए , बैचैन अब ये ख्वाब हुए।

शाम के रंगों में डूबा , चाय में गीला सूरज,
पढ़ता शक्लों के पन्नों को।
कब से जलता रहता है, बस आंखो में एक प्यास लिए,
इसके ख्वाबों को फुसलाकर, रात की ओट में,
पानी के दिये नवाब हुए , बैचैन अब ये ख्वाब हुए। 

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नरेंद्र पंत
दिसंबर 2018