पलों की जंग, कुछ झुलसे कुछ जीते पल,
फिर एक पहेली , फिर बूझू उसका हल ।
लाज रखूं ताक पर , देख कर जीजिविषा
छुपते हुए सूरज शर्म से हुए लाल ।
इठलाता, हाथ पर पत्ती से छाप मारूं,
बुनूं लकीरों के मुहाने पर कंटीले जाल ।
दिन और रात की बदलती पाली,
लुका-छुपी का खेल, मैदान भी खाली ।
हारूँ बरस की बाज़ी पर कदम बढाकर,
नोंच लूँ उस पार से इस पार एक साल ।
भूलूं सतरंगी जीवन का छोर आखिर,
कोरे कागज़ पर सफ़ेद स्याही का कमाल ।
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नरेन्द्र पन्त
२० सितम्बर , २०१३