एक पल में मौन,
वो साया सा , सूख गया आम के आचार की गुठली
में वो बात नहीं अब , फिर से आज मूंग की दाल ,
क्या बीमार हूँ मै ?
या हाल के झटके से उबरा नहीं अभी ,लो आ गया नया अखबार ,
एक और सुबह को चाय में डुबो लूँ , क्यूँ ?
अरे बता दूँ पानी को कि जिंदा हूँ , तू गरम सही मै नींद में ,
नरम कर लूँ दो और लम्हे , ठंडा न हो , इस भागती सुबह में
धड़कन को रोक ले , घडी के दो हाथ या दो पाँव , जकड ले .
अरे कल तेरी मनमानी का आखिरी दिन था ,
अब वादियाँ मेरी रजाई के मोड़ में
और सीमायें मेरे सपनो के छोर में छुपी हुई ,इस हँसी के पीछे राज क्या ? ये सपना क्या ...
ओह्ह ..
मम्मी उठ गया मैं , पानी मत डालो ,, चाय यही रख दो ..
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नरेन्द्र पन्त
फरवरी , २०१२