सांसे छोड़ता , यूहीं सरेराह तू दिख गया ,
जंगल से बिछड़ा, भरे बाज़ार में बिक गया ।
कहीं फिर तू, किवाड़ों में जकड़ा हुआ ,
कहीं है तू, रिवाज़ो में जलता हुआ,
कहीं तू डूबा हुआ, स्याही में रात दिन
कहीं तू नाव बन , समंदर में उड़ता हुआ ।
कहीं तू तस्वीर को, हाथो से थामकर,
वक़्त को कैद कर , खड़ा अकड़ा हुआ।
और मेरा एक शौक , तेरा घर जला गया
तपा कर कुनबे को , राख में मिला गया ।
तेरी ये कहानी लेकिन जानता कौन है,
सब कुछ सहते हुए ,
शोर भरे संसार में , वृक्ष तू मौन है ।