यूँ कलम उठा कर लिखने चला ,
स्याही ने पूछा मुझसे , क्यूँ भला
विचारो को मुझमे डुबो रहे हो?
शर्म से पानी पानी न हो जाऊं.
मैंने भुलावा दिया कि, गिनते रह
मेरे शब्दों की धड़कन,
और बिखरा दी काले अक्षरों में
मन की "कालिख".
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नरेन्द्र पन्त
१३ मार्च, २०११