Thursday, January 26, 2012
Tuesday, January 24, 2012
"अनकही बातें , अधूरे ख्वाब"
१:
लिखा पढ़ी के चक्कर में
जो लग गयी हाथ स्याही
रंग डाली किस्मत
अब फेर कर पानी
कौन (सा) रंग खोजू मैं .
क्यूँ बूझूं अगला कारनामा क्या रंग होगा ?
२:
तू उस पहाड़ी पर , मैं नदी के इस किनारे चीखता ,
तू उस पहाड़ी पर , मैं नदी के इस किनारे चीखता ,
चलो पतंग उड़ायें
हम न मिलें,
डोर को तो मिलने दो .
कट जाएगी? क्या?
यही इश्क है
यही इश्क है
नहीं तो ,
क्यूँ दुनिया कटी पतंग के पीछे भागती देखी?
३:
वो दुबकी , उस झाड के पीछे
( मेरे प्यारे खरगोश daisy की याद में . मिस यू daisy )
-- नरेन्द्र पन्त
( जनवरी २०१२)
क्यूँ दुनिया कटी पतंग के पीछे भागती देखी?
३:
वो दुबकी , उस झाड के पीछे
मेरे हाथ में लगे कांटो में
इन्द्रधनुषी रंग खोजती ,
कुछ दिन पहले का वाकया है
जाने कौन से कोने में जा छुपी,
अब किताब के पन्ने भी पीले
और सुबह की धूप भी
अब और लहू में कितने रंग मिलाऊं
वो सफ़ेद रंग कहाँ से लाऊं?
-- नरेन्द्र पन्त
( जनवरी २०१२)
Labels:
daisy,
good poems,
hindi,
my poems,
narendra pant
Sunday, January 15, 2012
"बदली" की बदली
मेरे हिस्से के बादल,
अँधेरे से लीप दे धूप,
कोयल को पता न चलने दे उजालों के वो गीत ,
जो बरसो मै आखिरी पन्ने सी ,
हाथों की लकीरों में कुरेदता रहा.
रख ले भर कर जो आंसू आज टपके हैं ,
दूर समंदर किनारे पहाड़ी से जा गले लग ,
सुना गुस्ताख ने बहुत नमक बटोर लिया किनारे पर.
--
नरेन्द्र पन्त
१५ जनवरी , २०१२
Saturday, January 14, 2012
"बेनाम बदलाव"
रख दूं एक सांस और ,
तोल
तोल
ले तराजू पे, तोड़ दे ये मापने का मायना.
बदलने दे धडकनों को कतारें,
लुट जाने दे उस पोटली में बंधे
मूंगफली के दो दाने,
बीते बरस के वो दाड़िम,
अब खट्टे रहे नहीं ,वो
रिश्ते जो कभी नासूर हुआ करते थे.
---
नरेन्द्र पन्त
१४ जनवरी , २०१२
Friday, January 6, 2012
बेमौसमी बसंत
अब तेरा ख़त पढ़कर गुनकर ,
मैंने अनछुआ अंकित किया .
छेड़कर अमिया की बातें,
कोयल को आतंकित किया .
घिरी हुई है वो इस नगरी में,
तिनको की दीवारों से,
जब बेमौसमी आम की बोरों ने
माली को शंकित किया.
--
नरेन्द्र पन्त
६ जनवरी , 2012
--
नरेन्द्र पन्त
६ जनवरी , 2012
Subscribe to:
Posts (Atom)
