विगत वर्ष के थक जाने पर , आई नए साल की बारी
न समझू ये बढ़ती है , या घटती जीवन की पारी ।
अभी पतझड़ को थामे , मैं करुँ आग का अंदेशा
पर उड़ते पन्ने , उड़ती स्याही , कैसे भेजूँ संदेशा ।
शब्दों की डोरी में भावों को उलझाता,
टालूं ये दिन, महीने, साल की बला,
मैं यूँ चला , मैं यूँ चला ।
इस सर्दी को , धूप की चादर की मांग,
कृषक के नयनो को , खादर की मांग ।
कोई कहे नदिया से , बिन बाढ़ के इस साल तू ,
माटी को सोना करने को बाण चला ।
सारी दुविधाओं पर एक-एक कील ठोकता,
यूँ दिखलाऊ नव एकत्व की कला,
मैं यूँ चला ,मैं यूँ चला।
--
नरेंद्र पंत
३१ दिसंबर , २०१४।
न समझू ये बढ़ती है , या घटती जीवन की पारी ।
अभी पतझड़ को थामे , मैं करुँ आग का अंदेशा
पर उड़ते पन्ने , उड़ती स्याही , कैसे भेजूँ संदेशा ।
शब्दों की डोरी में भावों को उलझाता,
टालूं ये दिन, महीने, साल की बला,
मैं यूँ चला , मैं यूँ चला ।
इस सर्दी को , धूप की चादर की मांग,
कृषक के नयनो को , खादर की मांग ।
कोई कहे नदिया से , बिन बाढ़ के इस साल तू ,
माटी को सोना करने को बाण चला ।
सारी दुविधाओं पर एक-एक कील ठोकता,
यूँ दिखलाऊ नव एकत्व की कला,
मैं यूँ चला ,मैं यूँ चला।
--
नरेंद्र पंत
३१ दिसंबर , २०१४।