जंगल के वीराने में जो ,आदि से रहता आया ,
प्रकृति माँ की गोद में ,खेला और इठलाया.
जो रक्षा करता धरती माँ की,भ्रष्ट हो चुके मनु पुत्रो से ,
नहीं छीनता वस्त्र धरा के, ढक लेता तन कुछ टुकडो से.
उसकी नग्नता को तुम पिछड़ापन कहते हो,
विचारों को संकीर्ण व पारंपरिक नाम देते हो.
जब इठलाते हो कुछ चीथड़ो में समंदर के किनारे,
मुझे भी बताओ क्यूँ खुद को आधुनिक कहते हो?
-- नरेन्द्र पन्त
२१ फरवरी, २०११