हवा के पांख लिए उड़ रही रेत,
नयनो में यूँ समां गयी ,
जैसे बरसो की प्यासी हो.
और ये नयन बह रहे हैं,
कह रहे हैं कि,
हम रेत के तूफां को बूंदों से बाँधने चले हैं,
अतिथि की व्याकुलता को साधने चले हैं .
है सुना तुमने कभी पानी से मेड़ को सहारा मिलता हुआ?
देखा क्या, कभी पानी की दीवार से बाँध बनता हुआ ?
-----नरेन्द्र पन्त
२५ अगस्त , २०१०