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Saturday, March 7, 2015

" रंग "

पिचकारी की धार में , खंजर के वार में ,
ढूंढ रहा गुलाल में , कहाँ छिपा है तू?

ऐब इतने छुपे तुझ में, तू काला, नीला, भूरा, पीला,
मैं भी कुछ ऐसा ही, क्या तू आ छुपा मुझ में?

देखता हूँ छुपकर तुझे, अपने ही भीतर अभी,
तू घुला हुआ हर सांस में , ये एहसास होता कभी,
पर जब खून के संग भागता , हाथ लग जाता तभी। 

है बैर तुझसे कुछ ऐसा , तेरे प्यार जैसा,
तू घुलता भी पानी में , और धुलता भी पानी में, 
सामने कमज़ोर सा , मज़बूत है कहानी में। 

तू उमंग है ? तरंग है ? या जीने का ढंग है ?
पर पता किसको , कौन ढूंढे , यहाँ छिड़ी जंग है.
तू रंग है,  हाँ रंग है।

-- नरेंद्र पंत
७ मार्च २०१५

Wednesday, August 15, 2012

"माँ तुझे सलाम"

माँ आज तुझे सलाम , कल करूँगा नीलाम,
सह लेगी अगले बरस की सलामी तक?
बदले आज़ादी के मायने , बचपन के लड्डू  से,
व्यंग में झुलसी जवानी तक.
कब तक भरम को गहराऊँ, साँसों को फुसलाऊ
तिरंगे की इस दो  दिनी रवानी पर.
बरसो इस नाव को खेकर,लहू के कई रंग लेकर
लो आ पहुंचे
उस गुलामी से इस गुलामी तक.
माँ , सह लेगी अगले बरस की सलामी तक ?

-- नरेन्द्र पन्त
15 अगस्त , 2012 

Friday, March 30, 2012

" पतंगे के पर "

कहाँ छिपी धड़कन ,टटोलू कलाई किसकी
कहाँ छुपा वो तन ? 
जो बादलो के आईने में ,
खुद को उकेरता , और बरस जाता ,
दोपहर की  धूल  भरी आंधी के बाद .
जिसकी आखिरी सांस का स्वर गूंजता ,
गरजती इस बदली को , मात देता .

सबक गीता का , पढ़ लिया , गुन लिया 
पर  व्यर्थ बुझ जाता क्यूँ , ये ज्ञान का तारा
जब सांस का दीपक , विदा करता लौ को 
पतंगे के परों पर बिठा. 
अनजान नगर या  मायके को ?

रीत के विपरीत है ,क्षण भर विस्मित हूँ ,
और व्याकुल भी , उत्सुक भी कि
बादल फिर घिर आये हैं.
पतंगे के पर निकल आये या नहीं ?

 -- नरेन्द्र पन्त 









Friday, February 10, 2012

सुबह

एक पल में मौन,
वो साया सा , सूख गया आम के आचार की गुठली
में वो बात नहीं अब , फिर से आज मूंग की दाल ,
क्या बीमार हूँ मै ? 
या हाल के झटके से उबरा नहीं अभी ,लो आ गया नया अखबार , 
एक और सुबह को चाय में डुबो लूँ , क्यूँ ? 
अरे बता दूँ पानी को कि जिंदा हूँ , तू गरम सही मै नींद में ,
नरम कर लूँ दो और लम्हे , ठंडा न हो , इस भागती सुबह में
धड़कन को रोक ले , घडी के दो हाथ या दो पाँव , जकड ले .
अरे कल  तेरी मनमानी का आखिरी दिन था ,
अब वादियाँ मेरी रजाई के मोड़ में 
और सीमायें मेरे सपनो के छोर में छुपी हुई ,इस हँसी के पीछे राज क्या ? ये सपना क्या  ...


ओह्ह ..
मम्मी उठ गया मैं , पानी मत डालो ,, चाय यही रख दो ..
-- 
नरेन्द्र पन्त 
फरवरी , २०१२

Tuesday, January 24, 2012

"अनकही बातें , अधूरे ख्वाब"

१:
लिखा पढ़ी के चक्कर में 
जो लग गयी हाथ स्याही 
रंग डाली किस्मत 
अब फेर कर पानी
कौन (सा) रंग खोजू मैं .
क्यूँ  बूझूं अगला कारनामा क्या रंग होगा ?

२: 
तू उस पहाड़ी पर , मैं नदी के इस किनारे चीखता ,
चलो पतंग उड़ायें 
हम न मिलें,
डोर को तो मिलने दो .
कट जाएगी? क्या?
यही इश्क है
नहीं तो , 
क्यूँ दुनिया कटी पतंग के पीछे भागती देखी?

३:

वो दुबकी , उस झाड के पीछे 
मेरे हाथ में लगे कांटो में 
इन्द्रधनुषी रंग खोजती ,
कुछ दिन पहले का वाकया है 
जाने कौन से कोने में जा छुपी,
अब किताब के पन्ने  भी पीले 
और सुबह की धूप भी 
अब और लहू में कितने रंग मिलाऊं
वो सफ़ेद रंग कहाँ से लाऊं?

( मेरे प्यारे खरगोश daisy  की याद में . मिस यू  daisy  ) 



-- नरेन्द्र पन्त
( जनवरी २०१२)

Sunday, January 15, 2012

"बदली" की बदली

मेरे हिस्से के बादल,
अँधेरे से लीप दे धूप, 
कोयल को पता न चलने दे उजालों के वो गीत ,
जो बरसो मै आखिरी पन्ने सी , 
हाथों की लकीरों में कुरेदता रहा.
रख ले भर कर जो आंसू आज टपके हैं ,
दूर समंदर किनारे पहाड़ी से जा गले लग ,
सुना गुस्ताख ने बहुत नमक बटोर लिया किनारे पर. 

--
नरेन्द्र पन्त 
१५ जनवरी , २०१२

Saturday, January 14, 2012

"बेनाम बदलाव"

रख दूं एक सांस और ,
तोल
ले तराजू पे, तोड़ दे ये मापने का मायना.
बदलने दे धडकनों को कतारें,
लुट जाने दे उस पोटली में बंधे 
मूंगफली के दो दाने,
बीते बरस के वो दाड़िम,
अब खट्टे रहे नहीं ,वो
रिश्ते जो कभी नासूर हुआ करते थे.

---
नरेन्द्र पन्त
१४ जनवरी , २०१२



Monday, November 28, 2011

"तू"

खींच कर ,समंदर के किनारे , रख लिए मोड़कर,
खफा जो लम्हे सारे ,अब भूल कर,
मेरी साँसों की आहट से क्या बूझता तू ?

 यूँ डुबाकर, दम घोंट दिया, आंसुओं का पानी में
उस नदी के किनारे अब कांटा डाले ,
 सर्दी की सुबह क्या खोजता तू ?

मिला है तू मेरी आहों से , साजिश में
मेरी कराहों से , टुकड़े टुकड़े कर मेरे
सुई धागा क्यूँ खोजता तू ?

-- नरेन्द्र पन्त
२८ नवम्बर ,२०११

Monday, September 19, 2011

"किश्त "

मियां हम किश्तों में खुद को क़त्ल कर रहे हैं और तुम हर किश्त में जीवन बीमा एजेंट की तरह रसमलाई सुड़क रहे हो . इतनी मोमबत्तियां क्यूँ जलाई है? दीवाली है क्या ? रावन मारा गया ? अच्छा तो ये मेरे जन्मदिन की ख़ुशी में हैं . वही तो मैं सोचू इस बार रावन जल्दी कैसे मर गया , हर साल तो जब मैं छुट्टी पर घर जाता हूँ तब मरता है . समय का बिलकुल पाबन्द. हमारे मोहल्ले में ठीक बारह बजे मरता है .
        पर पड़ोस वाले मुन्नू  , अरे मुन्नू जो वानर सेना में, इस साल लौलीपोप का लालच देकर भर्ती किया गया  ,उसका कहा माने तो  रावण अंकल , राम भैया का तीर लगने से पहले ही लुडक गए थे. थोड़ी सयानी रिंकी बोली उज्जा ( ओ इजा ) कही ज़हर तो नहीं पी लिया था, तो मुन्नू बोला पता नहीं , बोतल पर "गुलाब" का फूल बना था. चलो मुन्नू को समझ तो आया कि "गुलाब" पीने से इंसान मर सकता है और हम रोजाना ऐसे कई रावण देखते हैं लेकिन कुछ सीखते नहीं .
        जब से सही और गलत का भेद समझ में आया , तब से आज तक सही राह पकड़ने में हमेशा हिचकिचाहट रही . बचपन से सुनता आ रहा हूँ कि सच का रास्ता कठिन होता है, पर अभी तक हमेशा उससे विमुख रहा हूँ. जाने अनजाने सच का गला घोंटना दिनचर्या का अभिन्न अंग बन गया है. कॉर्नर हाउस ( एक रेस्तरां ) में बहुत दफा "डेथ बाई चाकलेट" खायी है, उस वक़्त उन करोडो लोगो की सूरत आँखों के सामने कभी नहीं  घूमती जिन्हें रात को खाली पेट सोना है और रात भर फुटपाथ पर अपनी दमड़ी का बिछोना बनाकर ठिठुरना है या सीखनी है जिनके बच्चे को गिनती ,अपना साथ छोडती हुई साँसों को गिनकर. शायद सही नाम रखा है - डेथ (मौत) तो होती ही है .. मार देता हूँ अपने ईमान को , डुबो देता हूँ उसे चाकलेट के दलदल में. आह ..छब्बीस साल लग गए  छोटी सी बात समझने में. जो चीज़े कल तक बहुत अच्छी लगा करती थी ,क्षण भर में बोझ लगने लगी हैं.
         हर साल २० सितम्बर आता है , अब समझ आया कि क्यूँ , वो ऊपर वाला हर बरस याद दिलाता है मुझे मेरे अस्तित्व की और खोजता है मेरे भीतर अपनी लौ ,जिसका मैं दम घोंटे बैठा हूँ. 
         हे ईश्वर, इस जन्मदिवस पर मुझे शक्ति देना कि मैं खुद से ऊपर ऊपर उठ सकूँ और ये जीवन स्वार्थो से परे हट ,प्राणी मात्र के उत्थान और सेवा कार्य में व्यतीत हो.

मन बहुत व्याकुल है .इकबाल साहब का पैगाम दोहरा लूं ..

 ""दयार-ए-इश्क में अपना मुकाम पैदा कर 
नया ज़माना, नए सुबह-ओ -शाम पैदा कर 
अपना तरीका है फकीरी , अमीरी नहीं 
"खुदी" न बेच , गरीबी में नाम पैदा कर"" - इकबाल

 
-- जन्मदिन मुबारक 
   नरेन्द्र पन्त 

Tuesday, August 16, 2011

"मेरी देशभक्ति"

स्व तंत्र व्यभिचारी  हुआ 
स्वार्थ  के सायों  में,
पुत गए मन कालिख से 
बटवारे की आहों में.
                         
मुझे सिखा दिया गया लिखना
इन काले अक्षरों में,
कोशिश लिखने की बहुत की 
पर कोई पढ़ नहीं  पाता.
                            
और ये,
बरसी उसी पुताई की
सालाना ताने देती मुझको, 
मैं ढोंग करता कुछ पल देशभक्ति का
और बलवा  होने छोड़ देता उसे, फिर एक साल तक.

---
नरेन्द्र पन्त 
१५ अगस्त ,२०११

Sunday, March 13, 2011

"कालिख"

यूँ कलम उठा कर लिखने चला , 
स्याही ने पूछा मुझसे , क्यूँ भला 
विचारो को मुझमे डुबो रहे हो?
शर्म से पानी पानी न हो जाऊं.

मैंने भुलावा दिया कि, गिनते रह  
मेरे शब्दों की धड़कन, 
और बिखरा दी  काले अक्षरों में
मन की "कालिख".

                 --  
                 नरेन्द्र पन्त 
                १३ मार्च, २०११

Friday, February 11, 2011

ज़िन्दगी की पहेली

आँख मलते जागती है ,घुटनों  पर भागती है
नाजाने क्यूँ बचपन की,सीमायें लांघती है

फिर  खुली आँख सोती है हर ठोकर पर रोती है
नानी की कहानी , बस सपनो में होती है 

और मैं
तुरुप की चाल चलू ,इसे लूटने  की आश में
रिश्तो की गाँठ लगाऊं , गले की फाँस में
ज्यू खिंचती गयी  डोरी , वो लहराई आकाश में
आह !  कट गयी देखो , अनंत की आश में


अब आँखें बंद हैं ,और नाड़ी भी थक गयी
गतिमान इस काल में ,मेरी दुर्गति रुक गयी
अब कोई दूसरा इस पहेली को बूझता है
देखूं तनिक, उसे क्या हल सूझता  है.

    -- नरेन्द्र पन्त
  ११ फरवरी , २०११ 









Monday, September 20, 2010

जन्मदिन -3 और आपदा

थोड़ी सी मुड़ी थी , और थोड़ा उडी थी
बादलों के मुकुट पर मोती सी जड़ी थी
मेरे सपनो को छींटे मार के धो देती ,
धरा का आलिंगन कर सखियों के संग रोती.

सवाँरती जीवन को, बुहारती पट माटी के
झीनी खुशबू में डुबो देती तन मन
घनघोर घननाद में उन्मुक्त विचरती
विरह की पीड़ा में बरबस बरसती

इस बरस पीड़ा अंतहीन बूझ पड़ती है ,
बूँद अपनी सखी का हाथ छोडती नहीं ,
बादल की पोटली में सूराख हो गया शायद
देवभूमि  को लील गया वो.
और विधाता की माया देखो --
आपदाओं की छाँव में आज "अल्मोड़ा" रह रहा,
कोई दूर मेरे जन्मदिन का गीत कह रहा ..


-- नरेन्द्र पन्त
२० सितम्बर , २०१०

Wednesday, August 25, 2010

अतिथि

हवा के पांख लिए उड़ रही रेत,
नयनो में यूँ समां गयी ,
जैसे बरसो की प्यासी हो.
और ये नयन बह रहे हैं,
कह रहे हैं कि,
हम रेत के तूफां को बूंदों से बाँधने चले हैं,
अतिथि की व्याकुलता को साधने चले हैं .
है सुना तुमने कभी पानी से मेड़ को सहारा मिलता हुआ?
देखा क्या, कभी पानी की दीवार से बाँध बनता हुआ ?

    -----नरेन्द्र पन्त
        २५ अगस्त , २०१०

Tuesday, May 25, 2010

"जन्मदिवस"

हल्दी की पोटली फिर से हाथ देते हो
मृत्यु की राह पर जीवन को साध देते हो.
सिर्फ एक तारीख बढ़ने भर से ,
जीवन की सीमायें माप लेते हो.

जीवन की ढलती सांझ पर
पल भर मैं कैसा समां बाँध लेते हो.
साँसों  की घटती उम्र को ,
क्यूँ "जन्मदिवस" का नाम देते हो ?

               --  नरेन्द्र पन्त 
                    मई , २०१०