मूरत की आँखे ढांपकर ,खेल दी अपनी चाल
व्यर्थ हुए प्रयत्न कब, बनी है न माटी की ढाल.
चुभो लो हजारो बरछी ,करो माँ को लहू लुहान
द्यूत में बाज़ी लगी है , उछालो मेरा सम्मान.
घोप दिया है खंजर तुमने आखरी उम्मीद पर,
बासंती फूलो की, ना बन सकी जयमाल .
छोड़ दिया हाथ मेरा , थामने का स्वांग रच,
या झट से खींच लिया, जब जब दिखी मैं बेहाल.
-- नरेन्द्र पन्त
२६ सितम्बर,२०११
या झट से खींच लिया, जब जब दिखी मैं बेहाल.
-- नरेन्द्र पन्त
२६ सितम्बर,२०११
1 comments:
nice words and poem..keep it up:)
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