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Saturday, March 7, 2015

" रंग "

पिचकारी की धार में , खंजर के वार में ,
ढूंढ रहा गुलाल में , कहाँ छिपा है तू?

ऐब इतने छुपे तुझ में, तू काला, नीला, भूरा, पीला,
मैं भी कुछ ऐसा ही, क्या तू आ छुपा मुझ में?

देखता हूँ छुपकर तुझे, अपने ही भीतर अभी,
तू घुला हुआ हर सांस में , ये एहसास होता कभी,
पर जब खून के संग भागता , हाथ लग जाता तभी। 

है बैर तुझसे कुछ ऐसा , तेरे प्यार जैसा,
तू घुलता भी पानी में , और धुलता भी पानी में, 
सामने कमज़ोर सा , मज़बूत है कहानी में। 

तू उमंग है ? तरंग है ? या जीने का ढंग है ?
पर पता किसको , कौन ढूंढे , यहाँ छिड़ी जंग है.
तू रंग है,  हाँ रंग है।

-- नरेंद्र पंत
७ मार्च २०१५

Wednesday, December 31, 2014

"मैं यूँ चला "

विगत वर्ष के थक जाने पर , आई नए साल की बारी 
न समझू ये बढ़ती है , या घटती जीवन की पारी 
अभी पतझड़ को थामे , मैं करुँ आग का अंदेशा
पर उड़ते पन्ने , उड़ती स्याही , कैसे भेजूँ संदेशा ।
शब्दों की डोरी में भावों को उलझाता,
टालूं  ये दिन, महीने, साल की बला,
मैं यूँ चला , मैं यूँ चला ।

इस सर्दी को , धूप की चादर की मांग,
कृषक के नयनो को , खादर की मांग ।
कोई कहे नदिया से , बिन बाढ़ के इस साल तू ,
माटी को सोना करने को बाण चला । 
सारी दुविधाओं पर एक-एक कील ठोकता,
यूँ दिखलाऊ नव एकत्व की कला,
मैं यूँ चला ,मैं यूँ चला।  

-- 
नरेंद्र पंत
३१ दिसंबर , २०१४।