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Monday, February 21, 2011

आदिवासी

जंगल के वीराने में जो ,आदि से रहता आया ,
प्रकृति माँ की गोद में ,खेला और इठलाया.

जो  रक्षा करता धरती  माँ की,भ्रष्ट हो चुके मनु पुत्रो से ,
नहीं छीनता वस्त्र धरा के, ढक लेता तन कुछ टुकडो से.

उसकी  नग्नता को तुम पिछड़ापन कहते हो,
विचारों को संकीर्ण व पारंपरिक नाम देते हो.
जब इठलाते हो कुछ चीथड़ो में समंदर के किनारे,
मुझे भी बताओ  क्यूँ खुद को आधुनिक कहते हो?

 -- नरेन्द्र पन्त 
     २१ फरवरी, २०११