कुछ और वक़्त बाकी था , वो एक साथी था ,
कुछ और कहने को, अब कुछ ना बाकी था ।
कर्तव्य पथ पर जान की, होली जली या दीवाली,
ओढ़ा जो तुमने शान से , रंग वो "खाकी" था।
उतार ना पाएगी ,तेरा एहसान रह गया बाकी,
तुम्हारे बलिदान से, सदियों सलामत रहे " खाकी " ।
सदियों सलामत रहे " खाकी "
🙏 नमन, साथियों को जो आज हमारे बीच नहीं है । ये दीपक आपके नाम।
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नरेंद्र पंत
27-अक्टूबर - 2019