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Wednesday, January 28, 2009

"भ्रमण अथवा परिभ्रमण" - गोल पृथ्वी

मैं किसी अन्य प्राणी की नक़ल पसंद नही करता हूँ , परन्तु अपनी एक परम "बिलाव" मित्र के विगत कुछ दिनों की लेखन के प्रति वाचाल प्रवृति से प्रेरित होकर अपनी बुद्धिमानी का गद्य हस्त्बद्ध कर रहा हूँ . सायंकाल के भ्रमण हेतु मैं अपने निवास स्थान से कई किलोमीटर की दूरी पर स्थित बी टी ऍम लेआउट से ब्रिगेड रोड के लिए निकला। वो एक उद्देश्य की पूर्ति के लिए की जा रही ऑटो रिक्शा यात्रा थी। अपना वाहन न होने की कुंठा उस वक्त ह्रदय को विदीर्ण कर देती है जब किसी मृगी की मोहक द्रिष्टी नयनो की चाहरदीवारी लांघकर आपके आँगन में अठखेलियाँ खेलने लगे और आप उसे सायंकाल के सूरज की तरह यातायात बत्ती पर डूबता देख रहे हों । इसे अपना सौभाग्य कहूँ या विपरीत , मन की यह चंचलता हमेशा चपलता के आयाम से वंचित रही। उन्ही जलती - बुझती बत्तियों का अनुसरण करते हुए वाहनों की कतार जोड़ता - तोड़ता हुआ मैं अपने गंतव्य पर पहुँच गया । द्रव्य का अनाकारण व्यय मन को थोड़ा सा स्थिर कर देता है । ऐसे मन वाला मैं, काले शत्रु की दूकान में चला गया जहाँ से मुझे अपना पतलून लेना था ( यहाँ यह बताना उचित समझूंगा कि यह काला शत्रु और कोई नही ब्लैक बैरी का शोरूम था ). पतलून लेकर मैंने अपने निवास स्थान के लिए पग बढाये ।

अमूमन नए स्थान पर भ्रमण दीर्घ कालीन अनिश्चितताओं का जनक होता है । मैं इस शहर का चांदनी चौक कहलाने वाले इस स्थल पर दूसरी बार आया था , पहली बार मैं यहाँ ठीक एक दिन पहले अपने मित्रो के साथ द्रव्य बहाने की दौड़ में भाग ले रहा था । मुझे यहाँ आने का मार्ग तो सही से पता था किंतु यहाँ से जाने का नही , कातर मन अपनी महाभारत के अभिमन्यु से तुलना करने में व्यस्त था और ह्रदय घर वापिस जाने के लिए आतुर । विद्वानों की भाषा शैली में मैं उपरोक्त वाक्य के आधार पर मूर्ख कहलाता अगर आने और जाने का मार्ग एक ही होता । मैंने उसी दिशा में कदम बढाये जहाँ से मैं पहले दिन अपने मित्रो के साथ आया था । इस समय सायंकाल के छः बज रहे थे । तब मैं उस मार्ग पर पहुँचा जहाँ से मैं अपने निवास स्थान अर्थात ब्रुक फिल्ड से आता हूँ , पर इस मार्ग पर वाहनों के गमन की दिशा मेरे गंतव्य के विपरीत थी । समय की हानि होता हुआ देख मैंने एक यातायात पुलिस कर्मी से मर्थाल्ली जाने का मार्ग पुछा । भारतीय परम्परा को निभाते हुए उसने मुझे बस पकड़ने के लिए स्टाप पहुँचने का मार्ग यूँ बताया - यहाँ से सीधे अगली बत्ती पे जाओ वहां से दाए फिर सीधे अगली बत्ती पर और फिर दाए वहां पर एक स्टाप है वहां से बस मिलेगी । सहायता कितनी ही पीडादायिनी हो , कृतज्ञता अपना अस्तित्व नही मिटने देती । मैंने उस व्याख्यान को सुनकर धन्यवाद कहा और बस पकड़ने की आशा में उस मार्ग पर चल दिया । मार्ग में पूर्व वर्णित पुरूष के दो और बंधुओ से सहायता लेते हुए मैं एक जगह पहुँचा । हास्यप्रद तथ्य यह है की मैं २ किलोमीटर दूरी तय करने के पश्चात वापस बिग्रेड रोड पर पहुँच गया था और मुझे ये पता नही चला कि मैं पिछले एक घंटे से एक वर्ग ( स्कुआ यर ) में गतिशील था , जिसका मेरे घर से निकटतम कोना ब्रिगेड रोड थी । हे ईश्वर ऐसे प्राणी को प्रणाम । मै ब्रिगेड रोड के बगल से निकलता हुआ सेंट्रल माल पहुँचा , उसे देखते ही मुझे बिलाव मित्र का स्मरण हो आया । मुझे ये पता था कि एक स्थान जिसे लाइफ स्टाइल कहते हैं अगर मैं वहां पहुँच जाऊं तो मुझे अपने घर के लिए बस मिल जायेगी । और मैं पथ मै आती हुए हर चकाचौंध भरे कोने को लाइफ स्टाइल समझ उठता था , सेंट्रल मॉल तो मुझे पास जाने पर पता चला दूर से तो वो मुझे लाइफ स्टाइल ही लगा था । उसके बाद एक मोड़ आया और मेरे मन का दीपक ज्योति से जगमगा उठा । अपनी संस्कृति से दूर जल रहे इस दीपक की बाती बहुत छोटी थी । सामने लाइफ स्टाइल की जगह भगवान् विष्णु का वाहन ( गरुड़ )अपने शरीर के कोटरों मे मनुष्यों की आवाजाही का द्योतक बना विराजमान था . अब तन और मन रूपी ईश्वर ज्योति मंद हो चुकी थी . दोनों विश्राम के लिए शेष सैया की इच्छुक थी। एक और यातायात कर्मी के सहयोग से मैंने उसी स्थान से वोल्वो बस पकड़ी और अपने निवास स्थान पहुँच गया । और मैंने ख़ुद को विजयी घोषित किया ।

अगर यह मेरी ज्यामिति अनुकरण का अंत होता तो शायद सही होता । मैंने ये गद्य भी नही लिखा होता । अगले ही दिन अपने किसी मित्र के साथ किसी कार्य के लिए फिर से मैं लाइफ स्टाइल से अगले स्टॉप रिचमोंड रोड गया । वहां पहुंचकर मुझे पिछले जून मे अपने कार्यस्थल के दर्शन हुए । और फिर से बस पकड़ने के लिए मैं उसे सड़क के आगे चलता रहा । मुझे नही पता था की मैं उसी मार्ग पर चल रहा हूँ जहाँ कल मैंने अपनी विजय यात्रा पूरी की थी । थोडी ही देर में एक स्थान पर मैंने पास के पेट्रोल पम्प को देखकर कहा कि ये मैंने कल भी घर जाते हुए देखा देखा था . थोड़ा गर्दन उठा कर देखा तो वह स्थान ब्रिगेड रोड का एक कोना था । अब मुझे ज्ञात हुआ कि मैं पिछले दिन एक ही स्थान का विभिन्न ज्यामितीय आकृतियों में परिभ्रमण कर रहा था । कल मैंने काले शत्रु से निकल कर जहाँ से अपनी पड़यात्रा शुरू कि थी , आज वही से मुझे वो बस मिल गई जिसकी मैंने कल परिभ्रमण काल में प्रतीक्षा की । रही लाइफ स्टाइल की बात , कठिन कठिन ज्यामितीय आकारों की जगह अगर मै एक सीधी रेखा में
गतिमान रहता तो मैं कल ही लाइफ स्टाइल के दर्शन कर लेता .और वहां से घर चला जाता ।

इसे मै ब्रिगेड रोड का भ्रमण कहू या परिभ्रमण , पर इससे मै ज्यामिति और विभिन्न ज्यामितीय आकारों की बरम्बारिक निरंतरता मै निपुण हो गया हूँ . और किंचित मात्र से स्थान में पृथ्वी गोल है इस सिद्धांत का मैंने प्रयोगात्मक अध्ययन कर लिया है ।