नहीं व्यर्थ, विश्वास अटल ,
फेरे में आज ,चकित क्यूँ कल,
सुलगा दी माटी , भाग लिखा
आजन्म सवांरा मेरा कल.
तोड़ रहे , बन आज अतिथि,
जीवन वट से दिन की पाती,
और सुखाते खुद ही उसको
गीली घास न पाए जल.
अगनित पल ले लो, जोड़ घटा लो ,
यत्न करो, सच ना झूठे,
गर विदा हुए तुम ,जग अनाथ हो ,
और धूमिल ये आते कल.
जिस जिस पल मैं थम जाऊं
रहूँ मैं माया में व्याकुल
एक पोखरन मुझे बनाना
कर देना विस्फोट "अटल"
-- नरेन्द्र पन्त