मुझे बचपन में ऊन का गोला बनाना बहुत अच्छा लगता था ,, वो भी जब जाड़े की धूप में पीठ सिक रही हो ..और एक डेक में नींबू सन रहा हो ,, व्यवधान बहुत आते थे और उन् पर गुस्सा भी बहुत .. अब कितनी बार मैं घर अर्थात शीत कक्ष के भीतर जाऊं .. कभी पिसी भांग लेने , तो कभी छोटा वाला चाकू लेने ..छोटी कटोरी और ना जाने क्या क्या. भांग सुनते ही मैं दुविधा में पड़ जाता था . सारे बड़े बुजुर्ग भांग को बुरा बताते थे पर भांग की चटनी और भुनी हुई भांग मुझे मिठाई से भी ज्यादा प्रिय थी थी क्या है . तो हमें वो खाने क्यूँ दी जाती थी. खैर छोड़िये भांग की बातें , कही नशा ना हो जाये लेखनी को. मेहनत का फल यहाँ मीठा कुछ क्षणों के लिए होता था ,, वो नींबू था सना हुआ नींबू ...खट्टा मीठा और थोड़ी देर धूप में रह जाए तो कड़वा भी..पर वो अनमोल था . कभी कभी उसमे माल्टा की मिलावट भी कर दी जाती थी और उनको लेने घर के भीतर ... नहीं मैं नहीं जाता था .. तब युद्ध होता था छोटे भाई से .. और अंततः माताजी की वो पुचकार की " तू ही तो मेरा लाडला बेटा है .. ये तो कुछ सुनता ही नहीं ":.. जा बेटा.. और "अगली बार से नहीं जाऊंगा" ये धमकी देकर वो भीतर जाकर समान ले आता .. . कभी कभी उपरोक्त वर्णित युद्ध , महा युद्ध में परिवर्तित हो जाता और वो मेरे चिड़ाने पे वो मेरे हाथ पे अपने दांतों से घडी बना देता .. घडी तो थी पर सुईयां गायब .. युद्ध विराम के लिए आने वाली तमाचो की सेना पलक झपकते ही आँखों के सामने होती थी. उसके लिए इंतज़ार शायद ही कभी करना पड़ा हो .. और शायद उस घडी में सुइयां ना होने का ये भी कारण रहा हो. उन् महासंग्रामो को लिपिबद्ध किया गया होता तो आज गिनती शायद हजारो में तो होती ही. हर एक घडी ने मुझे उस समय के और करीब ला खड़ा किया .समय मेरे अन्दर जी रहा था , मेरे हाथ में . बस में होता तो ढक लेता ,, जाने ना देता उसे ..लेकिन समय रुका है क्या कही किसी के लिए. बस आज इन महानगरो में एकाकी भ्रमण करता अपने बाजू की घडी को टटोलता हूँ. घडी तो मिलती नहीं . बस हाथ आती है तो नब्ज़ जो हर पल एहसास कराती है कि अभी बाकी हैं धूल मिटटी , कालिख और आक्सीजन कि कुछ घूंटे ..वो सना हुआ नींबू और उसमे सना माँ का प्यार , पिताजी कि फटकार और भाई की ललकार अब कहाँ .
--नरेन्द्र पन्त
जनवरी २५,२०११