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Tuesday, January 9, 2018

" बैचैन अब ये ख्वाब हुए "


पुराने घर के छज्जे पर लटके मधुमक्खी के छत्ते ,
निगरानी करते फूलों की अब,
जाने कब मुरझा जाये ये अरसा हुआ बरसात हुए,
बरसों किताब में सहेजे चिड़िया के पंख, 
अब उड़ने को बेताब हुए ,बैचैन अब ये ख्वाब हुए । 

रेत के दरिया में डूबी सफर की उम्मीदों के,
जम जाने की खाव्हिश में,
फूलों के बागों में जब, कांटो से दो हाथ हुए,
गुमसुम आंखो से बहते सपने, दीवारों से टकरा कर,
राहों के हमराह हुए , बैचैन अब ये ख्वाब हुए।

शाम के रंगों में डूबा , चाय में गीला सूरज,
पढ़ता शक्लों के पन्नों को।
कब से जलता रहता है, बस आंखो में एक प्यास लिए,
इसके ख्वाबों को फुसलाकर, रात की ओट में,
पानी के दिये नवाब हुए , बैचैन अब ये ख्वाब हुए। 

-
नरेंद्र पंत
दिसंबर 2018
 

Monday, January 19, 2015

भ्यास

अल्माड़ में नालि  बगनयी , कच्यार पट्ट बाट हये गयी 
नगर पालिका जे के छ , नरक पालिका हये ग्ये ।
मु  पजाम मल्ली के स्वेर बेर हिटनु  , 
पढ़ी लिखी मैस बोलनी ,
तौ  देखो कार्टून ।

कि करू हो, तुमर जस सहुर कां ,
तुमुल  झाड़ झाड़ बेर बाट में डालो  , 
घरक कुड़ देइ बटि भनका हालो,
मु ख्वार बचुने टिनक छात ढकनू  
पढ़ी लिखी मैस बोलनी ,
अये ग्यो कार्टून ।

जस अल्माड़क हाल छ , 
तौ प्रशासनक कमाल  छ , 
मैसनक चाल छ, पुरि दाल काव  छ। 
पोरी बेर ले कौ , आज ले कै गयुं 
जाग जाओ , तुम तो सैप छा 
म्योर  कि, 
मि तौ  भ्यास-क-भ्यासे  रे गयुं। 

--
नरेंद्र पंत
जनवरी २०१५